उत्तराखंड के 300 जलस्रोत सूखने की कगार पर! अब पंचायतें बचाएंगी नौले-धारे, सरकार ने शुरू की 'वॉटर ऑडिट'
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड, जिसे गंगा-यमुना जैसी विशाल नदियों का मायका कहा जाता है, आज खुद प्यासा होने की कगार पर है। नीति आयोग की चेतावनी और जल संस्थान की चिंताजनक रिपोर्ट के बाद धामी सरकार ने राज्य के पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने के लिए 'मास्टर प्लान' तैयार किया है। अब प्रदेश के गांवों में स्थित नौले, धारे और प्राकृतिक जलधाराओं के पुनर्जीवन की कमान सीधे ग्राम पंचायतों और वन पंचायतों को सौंपी जाएगी।
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में लगभग 300 प्राकृतिक जलस्रोत और नदियां या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि जो जलधाराएं कभी बारहमासी (हमेशा बहने वाली) थीं, वे अब केवल मानसून तक सिमट कर रह गई हैं। उत्तराखंड जल संस्थान के आंकड़े और भी डरावने हैं; राज्य की 500 पेयजल योजनाओं के स्रोत में पानी का स्तर 10 से लेकर 90 प्रतिशत तक कम हो गया है। शासन ने इस संकट से निपटने के लिए जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया है। पंचायती राज विभाग के विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि राज्य की सभी 7,817 ग्राम पंचायतों और 11,217 वन पंचायतों से उनके क्षेत्र में आने वाले जलस्रोतों की सूची मांगी गई है। पंचायतों को बताना होगा कि उनके यहाँ कितने जलस्रोत जीवित हैं और कितने सूख चुके हैं। रिपोर्ट मिलने के बाद 'सारा' (स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथारिटी) के माध्यम से प्रभावी कार्ययोजना बनाई जाएगी। जलस्रोतों के जीर्णोद्धार के लिए धन की कमी आड़े नहीं आएगी। डॉ. धकाते के अनुसार, केंद्र एवं राज्य वित्त आयोग से प्राप्त अनुदान का उपयोग इन कार्यों में किया जाएगा। यदि आवश्यकता पड़ी, तो शासन अलग से विशेष धनराशि भी उपलब्ध कराएगा। पारंपरिक जलस्रोतों का सूखना सीधे तौर पर पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन को बढ़ावा दे रहा है। जलस्रोतों के पुनर्जीवन से न केवल ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मिलेगा, बल्कि स्थानीय खेती और बागवानी को भी नई ऊर्जा मिलेगी। पंचायतों की इस भागीदारी से 'वॉटर गवर्नेंस' मजबूत होगी और पारंपरिक जल प्रबंधन की सदियों पुरानी तकनीक को आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से जोड़ा जाएगा। सरकार की इस पहल से उम्मीद जगी है कि सूखते हुए नौले-धारे फिर से कल-कल कर बहेंगे और 'आत्मनिर्भर उत्तराखंड' के साथ-साथ 'जल-निर्भर उत्तराखंड' का सपना भी साकार होगा।