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पहाड़ की खेती में लौटा 'सुनहरा युग': परंपरागत फसलों और एमएसपी ने रोकी पलायन की राह, आत्मनिर्भर बन रहे किसान

editor
  • Tapas Vishwas
  • May 10, 2026 01:05 PM
A 'Golden Era' Returns to Mountain Agriculture: Traditional Crops and MSP Halt Rural Exodus, Farmers Become Self-Reliant.

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कभी 'घाटे का सौदा' मानी जाने वाली खेती अब राज्य सरकार की विशेष पहल से आजीविका का सबसे मजबूत आधार बन रही है। आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन और ऐतिहासिक फैसलों के दम पर धामी सरकार ने पहाड़ के अन्नदाताओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। मडुवा से लेकर झंगोरा तक, अब देवभूमि के पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान के साथ-साथ सही दाम भी मिल रहा है।

पर्वतीय कृषि के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब राज्य सरकार ने मडुवा, रामदाना और झंगोरा जैसी स्थानीय फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित किया है। इससे बिचौलियों का खेल खत्म हो गया है और किसानों को उनकी उपज का सीधा लाभ मिल रहा है। इसके साथ ही सरकार इन फसलों की खेती पर विशेष सब्सिडी और प्रोत्साहन राशि भी दे रही है। पहाड़ की बिखरी हुई जोत (छोटे खेत) बड़ी बाधा थे, जिसका समाधान 'माधो सिंह भंडारी कृषि सहभागिता योजना' के रूप में निकाला गया है। सामूहिक खेती (कलस्टर फार्मिंग) के माध्यम से छोटे-छोटे खेतों को जोड़कर आधुनिक मशीनों और उन्नत तकनीक का उपयोग आसान हुआ है। उद्यान विभाग द्वारा वितरित किए जा रहे उन्नत किस्म के फलदार पौधों ने बागवानी को आय का मुख्य जरिया बना दिया है। पहाड़ों में ओलावृष्टि और अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाएं आम हैं। किसानों को इस जोखिम से बचाने के लिए कृषि और उद्यान फसलों को बीमा सुरक्षा के दायरे में लाया गया है। नुकसान होने पर अब किसानों को भटकना नहीं पड़ता, बल्कि बीमा राशि उनके आर्थिक नुकसान की भरपाई कर रही है। इन नवाचारों का सबसे सुखद परिणाम पलायन पर रोक के रूप में दिख रहा है। खेती में लाभ और सुरक्षा देखकर अब पहाड़ का युवा अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। आधुनिक कृषि और 'होमस्टे' जैसे प्रयासों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है। सरकार का यह 'कृषि मॉडल' न केवल टिकाऊ है, बल्कि आने वाले समय में उत्तराखंड को 'अग्रणी कृषि प्रदेश' बनाने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
 


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