• Home
  • News
  • A unique touch of folk culture has descended upon the fields of Bihar: To the tune of Kajri and traditional songs, women began planting paddy, hoping for a good harvest.

बिहार के खेतों में उतरी लोक संस्कृति की अनूठी छटा: कजरी और पारंपरिक गीतों की तान पर महिलाओं ने शुरू की धान की रोपाई,अच्छी फसल की आस

editor
  • Tapas Vishwas
  • June 29, 2026 01:06 PM
A unique touch of folk culture has descended upon the fields of Bihar: To the tune of Kajri and traditional songs, women began planting paddy, hoping for a good harvest.

पटना। बिहार में मानसून की दस्तक के साथ ही ग्रामीण अंचलों में रौनक लौट आई है और खेतों से मिट्टी की सोंधी खुशबू आने लगी है। राजधानी पटना के धनरूआ प्रखंड सहित विभिन्न ग्रामीण इलाकों में सोमवार, 29 जून से पारंपरिक और अनूठे अंदाज में धनरोपनी (धान की रोपाई) की शुरुआत हो गई है। सावन और आषाढ़ के इस संधिकाल में खेतों का नजारा देखने लायक है, जहां घुटने भर कीचड़ और पानी से भरे खेतों में कड़ी मेहनत के बावजूद महिला किसानों के चेहरों पर गजब की मुस्कान और उत्साह है। ग्रामीण संस्कृति को जीवंत रखते हुए महिलाएं सामूहिक रूप से झूमते और पारंपरिक कजरी गीत गाते हुए धान के पौधों को धरती के आंचल में रोप रही हैं।

बिहार के गांवों में सदियों से यह बेहद खूबसूरत सामाजिक व्यवस्था और परंपरा चली आ रही है कि धान की रोपनी का मुख्य जिम्मा महिलाएं ही संभालती हैं। वहीं, घर और गांव के पुरुष खेतों से मोरी (धान का बिचड़ा) उखाड़ने और उसका बंडल (बोझा) बनाकर महिलाओं तक पहुंचाने का काम करते हैं। ग्रामीणों में यह पुरानी और अटूट मान्यता है कि महिलाओं के कोमल हाथों से की गई रोपनी से धान की फसल न केवल रोगमुक्त रहती है, बल्कि पैदावार भी बंपर होती है। पीढ़ियों से चली आ रही इस रीत का पालन आज भी पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ किया जा रहा है। खेतों में रोपाई कर रही महिला किसान गीता देवी ने बताया कि काम के दौरान "घोड़वा चढ़ल छोटका देवरवा" जैसे कई पीढ़ियों पुराने लोकप्रिय लोकगीत गाए जाते हैं। वहीं किसान सुनीता देवी के अनुसार, इन गीतों का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक महत्व भी है। लगातार झुककर धान रोपने से होने वाली शारीरिक थकान इन मधुर गीतों और आपसी हंसी-मजाक से पल भर में दूर हो जाती है। संगीत की लय के साथ काम करने से महिलाओं में एक नई ऊर्जा का संचार होता है और काम की गति भी बढ़ जाती है। रोपाई शुरू करने से पहले महिलाएं खेतों की मेड़ की विशेष पूजा भी करती हैं, ताकि खेत हमेशा पानी से लबालब भरे रहें और भगवान इंद्र प्रसन्न होकर झमाझम अमृत बरसाएं। हालांकि, इस बार मानसून की बेरुखी ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। राज्य में 11 जून को मानसून ने प्रवेश तो किया था, लेकिन धीरे-धीरे वह कमजोर पड़ गया। मौसम के आंकड़ों के मुताबिक, इस समय तक बिहार में करीब 140 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन अब तक मात्र 70 मिमी ही वर्षा दर्ज की गई है, जो कि सामान्य से 50 प्रतिशत कम है। बारिश की कमी के कारण खेतों में उमस भरी गर्मी बरकरार है। जिन किसानों ने समय पर बिचड़ा तैयार कर लिया था, वे अब निजी संसाधनों जैसे पंपसेट के सहारे खेतों की सिंचाई कर रोपाई करने को मजबूर हैं। हालांकि, मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान ने उम्मीद जगाई है कि 29 जून से मानसून एक बार फिर सक्रिय हो रहा है, जिससे अगले 4 दिनों तक अच्छी बारिश के आसार हैं। मसौढ़ी के अनुमंडल कृषि पदाधिकारी सुधीर कुमार शाह ने बताया कि मसौढ़ी, धनरूआ और पुनपुन को मिलाकर तकरीबन 30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती का लक्ष्य रखा गया है। कृषि कार्यालय के अनुसार, पिछले साल खरीफ फसलों की बुवाई में 7% का इजाफा देखा गया था। अधिकारियों का मानना है कि भले ही कुछ जगहों पर बिचड़े खराब होने से किसान परेशान हैं, लेकिन समय पर रोपाई होने से पैदावार हमेशा बेहतर होती है। जैसे ही मानसून पूरी तरह रफ्तार पकड़ेगा, धनरोपनी के कार्य में और तेजी आएगी। फिलहाल, लोकगीतों की तान और बादलों की गड़गड़ाहट के बीच बिहार के अन्नदाता एक बार फिर देश का पेट भरने के लिए खेतों में डट गए हैं।


संबंधित आलेख: