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बनभूलपुरा हिंसा केस में अब्दुल मलिक की जमानत बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने UAPA लगाने पर उठाए गंभीर सवाल

editor
  • Awaaz Desk
  • July 31, 2026 09:07 AM
Abdul Malik's bail upheld in Banbhoolpura violence case; Supreme Court raises serious questions regarding the invocation of UAPA.

हल्द्वानी। उत्तराखण्ड के चर्चित बनभूलपुरा हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट  ने सवाल उठाया कि यदि कोई भीड़ पुलिस थाने में आग लगा देती है तो मात्र इसी आधार पर UAPA कैसे लागू किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था और UAPA दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में उत्‍तराखंड सरकार की उस याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें हल्‍द्वानी के बनभूलपुरा हिंसा मामले के मुख्‍य आरोपी अब्‍दुल मलिक को उत्‍तराखंड हाईकोर्ट की तरफ से दी गई आदेश को चुनौती दी गई थी।  कोर्ट ने मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को हाईकोर्ट से मिली जमानत को बरकरार रखा और उत्तराखंड सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी, हांलाकि सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल मलिक को हाईकोर्ट से मिली जमानत को बरकरार रखा और उत्तराखंड सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत का मुख्‍य फोकस मामले में यूएपीए की धाराएं लगाए जाने की वैधता और आवश्‍यकता पर रहा। अदालत ने इस बात पर गहरी आपत्ति जताई कि केवल हिंसक घटना के आधार पर आतंकवाद विरोधी कानून लागू करना उचित है या नहीं। जस्टिस जॉयमाल्‍या बागची ने कहा कि यदि कोई भीड़ पुलिस थाने में आग लगा देती है तो मात्र इस आधार पर यूएपीए कैसे लागू होगा। सार्वजनिक व्‍यवथा और यूएपीए के तहत आने वाले अपराध अलग-अलग प्रकृति के होते हैं और दोनों को एक समान नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी मामले में यूएपीए लगाने के लिए कानून में विशेष परिस्थितियों और गंभीर धाराओं की आवश्‍यकता होती है। उत्तराखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने अदालत में कहा कि यह केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने का मामला नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था। उन्होंने अदालत को बताया कि ट्रायल कोर्ट का आदेश पर्याप्त कारणों से रहित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार अब्दुल मलिक के घर का इस्तेमाल कथित साजिश की बैठकों के लिए किया गया था और हिंसा पूर्व नियोजित थी। सरकार ने तर्क दिया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को जमानत देना उचित नहीं था। सरकार की दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा, "व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसी अदालत के आदेश की कमी या अपर्याप्तता पर नहीं, बल्कि अभियोजन पक्ष के मामले की मजबूती पर निर्भर करती है।" अदालत की इस टिप्पणी को आरोपी के संवैधानिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी मामले पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मामले में आरोप साजिश से जुड़े हैं। साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अब्दुल मलिक करीब दो वर्षों से जेल में हैं। अदालत ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में है और मुकदमे की प्रक्रिया अभी जारी है। गौरतलब है कि 15 अप्रैल को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बनभूलपुरा हिंसा मामले के कथित साजिशकर्ता और मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की जमानत याचिका पर सुनवाई की थी।सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मामले में दर्ज मुकदमों में उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उत्तराखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
 


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