Advocate's Day:अधिवक्ताओं के बिना नही की जा सकती न्याय की कल्पना!क्यों मनाया जाता है ये खास दिन? क्यो होती थी वकीलों के गाउन के पीछे दो जेब?
भारत:3/12/2022
आज 3 दिसंबर को अधिवक्ता दिवस यानी एडवोकेट डे मनाया जाता है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति और प्रतिष्ठित वकील डॉ राजेंद्र प्रसाद के जन्मदिवस पर भारत में अधिवक्ता दिवस मनाया जाता है। डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति के साथ साथ संविधान समिति के अध्यक्ष भी थें।
वकालत पूरी दुनियां में शायद सबसे ज़्यादा सम्मानीय और गरिमामय पेशा है,क्योंकि एक सामान्य नागरिक भी इस पेशे से न्याय की उम्मीद रखता है।भारत की सारी न्याय व्यवस्था अधिवक्ता के काम पर टिकी हुई है। इतना कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि न्याय मिल ही इसलिए रहा है क्योंकि अधिवक्ता उपलब्ध है। अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी है, कभी कभी वह न्यायधीश से उच्च स्तरीय मालूम होतें है क्योंकि संपूर्ण न्याय व्यवस्था का भार इन ही काले कोट के कंधों पर है। अगर अधिवक्ता न हो तो भारत की जनता को न्याय मिलना असंभव सा हो चले।
भारत में भी वकालत गरिमामय पेशे के तौर पर हर दौर में बना रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में वकीलों से अधिक योगदान किसी और पेशे का नहीं रहा। स्वतंत्रता संग्राम में वकीलों ने जमकर लोहा लिया है। स्वतंत्रता ही नहीं बल्कि जब स्वतंत्रता मिली और नए भारत को गढ़ने का समय आया तब भी वकीलों की महत्ता बनी रही।
महात्मा गांधी से लेकर बी आर अम्बेडकर तक लोग वकालत के पेशे से अपने जीवन की शुरुआत करने वाले रहे हैं। इन सब भारत की महान विभूतियों के शुरुआती पेशे वकालत ही रहे बाद में यह लोग भले राष्ट्रपति और मंत्री हुए परन्तु प्रारंभ में वकील ही रहे।
एक दौर में वकालत इंग्लैंड का राजशाही पेशा रहा। संभ्रांत घरानों के लोग वकालत करते थे। वकील के गाउन में पीछे दो जेब होती थी, इन पीछे दो जेबों का अर्थ था अपने क्लाइंट से कोई राशि नहीं मांगी जाना अर्थात क्लाइंट जो भी चाहे अपनी इच्छानुसार जेब में परिश्रमिक यानी फीस डाल जाए।
इस पेशे का अजीब रहस्य भी है कि इस ही पेशे में एक ही विषय यानी लॉ (कानून) का अध्ययन कर कोई व्यक्ति अच्छी संपदा एकत्रित कर लेता है और कोई वही का वहीँ रह जाता है। इतना रहस्यमय पेशा शायद ही कोई दूसरा हो। वकालत में पैसों के मामले में एक बात ये भी देखने को मिलती है कि जो जितना अधिक योग्य यानी काबिल वकील होगा वो उतना ही ज़्यादा धनवान और सफल होगा। लेकिन कई जगह ये भी देखने को मिलता है कि जो वकील धनवान हो रहे है या हो चुके उनमें से कुछ ने अपने पेशे के साथ न्याय नही किया यानी झूठ को सच और सच को झूठ दिखाकर पैसा कमा रहे है।
बाजारवादी सोच के चलते वकालत जैसा गरिमामय और सम्मानीय पेशा भी दागदार होने लगा है। ज़्यादा धन कमाने के उद्देश्य से आज पक्षपाती वकालत की जाने लगी है। आज सफलता का अर्थ धन कमाना है, सफल वही है जिसने अधिक धन अर्जित है। क्योंकि सारा परिवेश ही इस प्रकार का बना हुआ, वैधानिक से लेकर सामाजिक व्यवस्था पूरी तरह धन के आसपास है इसलिए वकालत भी धन कमाने के साधन के रूप हो चली है।
लेकिन इसके बावजूद भी भारत ही नही बल्कि हर देश मे न्याय की उम्मीद काले कोट पहने वकीलों से ही की जाती है,और कई ईमानदार वकील इन उम्मीदों पर खरे भी उतरते है। कई वकीलों को कोर्ट में उन मुवक्किलों के साथ भी खड़े होता देख सकते है जिनके पैरों में टूटी फूटी चप्पल हाथ मे झोला होता है लेकिन आंखों में न्याय की उम्मीद होती है और पूरा विश्वास होता है कि जिस वकील के पास मैं खड़ा हूँ मुझे न्याय यही दिलवाएगा। और ये गिने चुने वो वकील होते है जो निस्वार्थ भाव से अपने पेशे के साथ ईमानदारी बरतते हुए ऐसे कमजोर बेसहारा गरीब लोगों से एक रुपया फीस तक नही लेते। ऐसे वकीलों को भी कोटि कोटि नमन है ।