सुप्रीम कोर्ट का एक और ऐतिहासिक फैसलाः पिता की मौत के बाद मां ही गार्जियन, बच्चों का सरनेम बदलने का पूरा हक! कहा- मां बच्चों को दूसरे पति का सरनेम भी दे सकती है
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि पिता की मौत के बाद मां को बच्चों का सरनेम बदलने का पूरा हक है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को भी रद्द कर दिया है जिसमें महिला को निर्देश दिया गया था कि वह अपने नए पति का नाम रिकॉर्ड्स में बच्चे के सौतेले पिता के तौर पर दिखाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी मां बच्चे के बायोलॉजिकल पिता की मौत के बाद उसकी इकलौती लीगल और नैचुरल गार्जियन होती है। उसे अपने बच्चे का सरनेम तय करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि अगर वह दूसरी शादी करती है तो वह बच्चे को दूसरे पति का सरनेम भी दे सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मां अपने बच्चे को दूसरे पति को गोद लेने का अधिकार भी दे सकती है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने पहले के फैसलों का भी जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मां को पिता के समान ही बच्चे का नैचुरल गार्जियन बताया था।
सुप्रीम कोर्ट में यह केस आंध्र की अकेला ललिता ने दायर किया था। ललिता ने 2003 में कोंडा बालाजी से शादी की थी। मार्च 2006 में उनके बेटे के जन्म के तीन महीने बाद कोंडा की मौत हो गई। इसके बाद अकेला के सास-ससुर ने बच्चे का सरनेम बदलने पर विवाद खड़ा कर दिया।
ललिता ने पति की मौत के एक साल बाद भारतीय वायुसेना में विंग कमांडर अकेला रवि नरसिम्हा सरमा से शादी की। इस विवाह से पहले ही दंपती का एक बच्चा और था। ये सभी एक साथ रहते हैं। जब विवाद शुरू हुआ उस समय बच्चा अहलाद अचिंत्य महज ढाई महीने का था। अब उसकी उम्र 16 साल और 4 महीने है।
सास-ससुर ने पोते का सरनेम बदलने पर किया केस अहलाद के दादा-दादी ने 2008 में अभिभावक और वार्ड अधिनियम 1890 की धारा 10 के तहत पोते का संरक्षक बनाने की याचिका दायर की थी। इसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था। इसके बाद दादा-दादी ने आंध्र हाईकोर्ट में याचिका लगाई कि बच्चे का सरनेम कोंडा से बदलकर अकेला कर दिया गया है। ललिता को गार्जियन मानते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें बच्चे का सरनेम कोंडा करने का निर्देश दिया।