अयोध्याः अवैध प्लाटिंग का बढ़ता जाल! विकास प्राधिकरण पर उठ रहे सवाल
अयोध्या। अयोध्या में अवैध प्लाटिंग और बिना स्वीकृत नक्शों के निर्माण का जाल तेजी से फैलता जा रहा है। लगातार हो रहे अनियमित निर्माणों ने विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विकास प्राधिकरण के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और अवर अभियंताओं की मिलीभगत से यह पूरा खेल खुलेआम संचालित हो रहा है। सूत्रों के अनुसार बिना मानचित्र स्वीकृति के बहुमंजिला इमारतों का निर्माण अब सामान्य बात बन चुकी है। आरोप है कि निर्माण की प्रत्येक मंजिल के हिसाब से अलग-अलग रेट तय किए गए हैं और कथित सेटिंग के बाद निर्माण कार्य को तेजी से पूरा कराया जाता है। कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जाती हैं, जबकि वास्तविक अवैध निर्माण पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। अयोध्या के खाले का पुरवा क्षेत्र में रेलवे लाइन के किनारे कई बीघा जमीन पर अवैध प्लाटिंग किए जाने का मामला भी चर्चा में है। विकास प्राधिकरण के अवर अभियंता सहित अधिकारी मौके पर पहुंचे जरूर, लेकिन बिना किसी ठोस कार्रवाई के वापस लौट गए। इसके बाद भी वहां निर्माण और प्लाटिंग का कार्य लगातार जारी है। विकास प्राधिकरण के प्रवर्तन विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि अवर अभियंताओं के अधीन कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मचारी पहले क्षेत्र में दबदबा बनाते हैं और फिर अवैध वसूली का खेल शुरू हो जाता है। जब शिकायतें बढ़ती हैं तो कुछ स्थानों पर बुलडोजर चलाकर दिखावटी कार्रवाई की जाती है, लेकिन बाद में वही जमीन फिर से प्लाटिंग कर बेच दी जाती है। भू-माफिया तेजी से प्लॉट बेच रहे हैं। बाद में जब इन्हें अवैध घोषित किया जाता है, तब सबसे बड़ा नुकसान आम खरीदारों को उठाना पड़ता है, जिनकी जीवनभर की जमा पूंजी दांव पर लग जाती है। वहीं अयोध्या से सरायरासी, भरतकुंड सोहावल रुदौली में अवैध प्लाटिंग का जाल बिछ चुका है वहीं नाम न छापने की शर्त पर प्राधिकरण के एक अधिकारी ने बताया कि अवैध प्लाटिंग को लेकर विभाग में दबाव बनाकर सेटिंग की जाती है और पहले पूरे प्लॉट बिना बाउंड्री के दिखाकर बेचा जाता है और फिर अचानक मकान निर्माण की शर्त पर 1 माह में निर्माण हो जाता है। सारी सेटिंग उच्चाधिकारियों की देखरेख में होती है जिसके एवज में बड़ी सुविधा शुल्क लिया जाता है। आरोप है कि कुछ अधिकारियों और अन्य लोगों के कार्यक्षेत्र में बड़े पैमाने पर अनियमित निर्माण हो रहे हैं, लेकिन जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रवर्तन विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद इतने व्यापक स्तर पर अवैध प्लाटिंग आखिर कैसे हो रही है। क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर सिस्टम के भीतर गहरी मिलीभगत काम कर रही है? फिलहाल यह मामला विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बनता जा रहा है।