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बच्चों की पढ़ाई या कारोबार? महंगी किताबें थोपने वाले 10 और स्कूलों को 'कारण बताओ' नोटिस; अब सुधरें या तालाबंदी को रहें तैयार!

editor
  • Tapas Vishwas
  • May 05, 2026 07:05 AM
Children's Education or Business? 'Show-Cause' Notices Issued to 10 More Schools for Imposing Expensive Textbooks; Shape Up Now or Be Prepared for Closure!

हल्द्वानी। नैनीताल जिले में निजी स्कूलों की मनमानी और अभिभावकों के आर्थिक शोषण के खिलाफ प्रशासन ने अब तक की सबसे बड़ी घेराबंदी शुरू कर दी है। जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल के कड़े रुख के बाद शिक्षा विभाग ने हल्द्वानी के 10 और प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों को 'कारण बताओ' नोटिस जारी कर हड़कंप मचा दिया है। मुख्य शिक्षा अधिकारी ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि 15 दिन के भीतर व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं, तो स्कूलों की मान्यता रद्द करने की विधिक कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी।

हल्द्वानी में निजी स्कूलों की मनमानी पर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। महंगी किताबें थोपने, अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डालने और दुकानों से कथित सांठगांठ के आरोपों के बीच 10 और निजी विद्यालयों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। साफ संदेश है नियमों का पालन करें, वरना मान्यता रद्द होने तक की कार्रवाई के लिए तैयार रहें। यह कार्रवाई जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल के निर्देश पर की गई है। मुख्य शिक्षा अधिकारी गोविंद राम जायसवाल ने प्राप्त शिकायतों और जांच रिपोर्ट के आधार पर यह कदम उठाया। जिन स्कूलों को नोटिस मिला है, उनमें वुडलैंड सीनियर सेकेंडरी स्कूल, डी लैंप पब्लिक स्कूल, दर्पण पब्लिक स्कूल, इम्युनल पब्लिक स्कूल, हाइलेंडर्स पब्लिक स्कूल, ग्रीन सिटी पब्लिक स्कूल, टेंडर फीट पब्लिक स्कूल, एल्केमे स्कूल, जय दुर्गे एजुकेशनल पब्लिक स्कूल और न्यू फेगलैंड पब्लिक स्कूल शामिल हैं। गौरतलब है कि इससे पहले भी हल्द्वानी, लालकुआं, रामनगर, भवाली और भीमताल क्षेत्रों के 28 विद्यालयों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। यानी अब तक कुल 38 स्कूल प्रशासन की कार्रवाई के दायरे में आ चुके हैं। जांच में सामने आया कि कई निजी स्कूल निर्धारित पाठ्यक्रम से हटकर एनसीईआरटी के बजाय महंगी निजी प्रकाशकों की किताबें अनिवार्य कर रहे हैं। इससे अभिभावकों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। इतना ही नहीं, कुछ स्कूलों पर यह आरोप भी है कि वे खास दुकानों से ही किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बना रहे हैं, जिससे ‘कमीशन सिस्टम’ की आशंका भी जताई जा रही है। प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के उल्लंघन से जोड़ा है। अधिकारियों का कहना है कि शिक्षा को व्यवसाय बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। नोटिस में स्कूलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि 15 दिनों के भीतर संशोधित पुस्तक सूची जारी करें और एनसीईआरटी पुस्तकों को प्राथमिकता दें। किसी भी विशेष दुकान से खरीद की अनिवार्यता तत्काल समाप्त की जाए। साथ ही, स्कूल अपनी वेबसाइट पर पुस्तक सूची और फीस संरचना का पूरा खुलासा करें। इसके अलावा, अभिभावकों द्वारा पहले से खरीदी गई अनावश्यक किताबों के लिए धनवापसी या समायोजन की व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए हैं। स्कूलों को यह भी कहा गया है कि यदि उन्होंने अतिरिक्त शुल्क वसूला है, तो उसे आगामी फीस में समायोजित किया जाए। जिलाधिकारी के निर्देश पर विकासखंड स्तर पर संयुक्त जांच समितियां गठित की गई हैं, जो 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगी। यदि तय समयसीमा में स्कूलों ने नियमों का पालन नहीं किया, तो उनकी मान्यता निलंबित या रद्द की जा सकती है, साथ ही कड़ी कानूनी कार्रवाई भी होगी। प्रशासन की इस कार्रवाई से अभिभावकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं निजी स्कूलों में हड़कंप मचा हुआ है। अब देखना होगा कि स्कूल नियमों के अनुसार खुद को ढालते हैं या सख्त कार्रवाई का सामना करते हैं।
 


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