मानव तस्करी पर सीआईडी का 'मेगा स्ट्राइक': लापता होते ही तुरंत दर्ज होगी एफआईआर, तलाश से लेकर पुनर्वास तक का नया मास्टर प्लान जारी
रांची। झारखंड में मानव तस्करी के काले नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करने और लापता लोगों, विशेषकर मासूम बच्चों की सुरक्षित व त्वरित बरामदगी के लिए सीआईडी झारखंड ने एक बेहद सख्त और प्रभावी एक्शन प्लान तैयार किया है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों के आलोक में बनाए गए इस नए मास्टर प्लान को धरातल पर उतारने के लिए राज्य के सभी जिलों के एसएसपी और एसपी को दिशा-निर्देश भेज दिए गए हैं। इस नई व्यवस्था के तहत अब पुलिस लापता होने के मामलों को केवल एक सामान्य गुमशुदगी (सनहा) मानकर ठंडे बस्ते में नहीं डाल पाएगी, बल्कि पहले दिन से ही इसे बेहद गंभीरता से लिया जाएगा।
यह पूरी कवायद सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'जी. गणेश बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य' के मामले में दिए गए महत्वपूर्ण फैसले के बाद शुरू हुई है। अदालत के आदेश पर झारखंड के गृह विभाग ने डीजीपी, महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव तथा सीआईडी के एडीजी को राज्य स्तर पर एक ठोस और त्वरित कार्ययोजना बनाने का निर्देश दिया था, जिसे अब अमलीजामा पहना दिया गया है। इस नए एक्शन प्लान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब किसी भी व्यक्ति या बच्चे के लापता होने की सूचना मिलने पर संबंधित थाने को बिना किसी हीला-हवाली के तत्काल प्राथमिकी दर्ज करनी होगी। जांच को कानूनी रूप से मजबूत बनाने के लिए सीआईडी ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि सभी प्राथमिकियों में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की प्रासंगिक और कड़ी धाराओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। यदि शुरुआती नजर में मामला अपहरण या मानव तस्करी से जुड़ा प्रतीत होता है, तो सख्त कानूनी प्रावधान जोड़े जाएंगे। हालांकि, पुलिस को एक व्यावहारिक राहत भी दी गई है; यदि लापता व्यक्ति सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर सुरक्षित मिल जाता है, तो संबंधित जिले के एसपी के पास यह अधिकार होगा कि वे मामले को कोर्ट भेजे बिना अपने स्तर पर ही समाप्त कर सकें। पहले के नियमों के तहत स्थानीय पुलिस लंबे समय तक खुद ही जांच करती रहती थी, जिससे तस्करों को भागने का मौका मिल जाता था। लेकिन अब नई व्यवस्था के तहत यदि पुलिस को शुरुआती जांच में ही मानव तस्करी या किसी संगठित गिरोह की संलिप्तता का जरा भी अंदेशा होता है, तो उन्हें 4 महीने तक केस अपने पास रखने की जरूरत नहीं है। ऐसे मामलों को तत्काल 'एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट' या किसी अन्य विशेष जांच इकाई को ट्रांसफर कर दिया जाएगा, ताकि विशेषज्ञ अधिकारी तेजी से रेस्क्यू ऑपरेशन चला सकें। सीआईडी के नए प्लान में पीड़ितों की सुरक्षा और उनके पुनर्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसके तहत कुछ बेहद कड़े और नए नियम बनाए गए हैं। बरामद किए गए लापता व्यक्ति का आधिकारिक एजेंसी के माध्यम से तत्काल बायोमेट्रिक सत्यापन (फिंगरप्रिंट और डेटा) कराया जाएगा। यदि पीड़ित के पास विशिष्ट पहचान संख्या या कोई वैध पहचान पत्र (जैसे आधार आदि) उपलब्ध नहीं है, तो प्रशासन तत्काल उसे बनवाने की प्रक्रिया शुरू करेगा। कोर्ट के अनुसार, इससे भविष्य में पीड़ितों की ट्रैकिंग और पहचान अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगी और बार-बार लापता होने के मामलों पर रोक लगेगी। बरामदगी के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत पहचान और संबंधों का पूरा वेरिफिकेशन होगा, तभी पीड़ित को परिवार के सुपुर्द किया जाएगा। यदि जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है कि परिवार का कोई सदस्य या अभिभावक खुद ही मानव तस्करी या बच्चे को गायब कराने में शामिल था, तो पीड़ित को उनके हवाले कतई नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में उसकी सुरक्षा, रहने और देखभाल की पूरी जिम्मेदारी 'बाल कल्याण समिति' को सौंपी जाएगी। इस पूरे एक्शन प्लान को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल की व्यवस्था की गई है। जिस भी जिले से पीड़ित की बरामदगी होगी, वहां की 'जिला बाल संरक्षण इकाई' अपने दायित्वों का प्राथमिकता से निर्वहन करेगी। जरूरत पड़ने पर जिलाधिकारी (डीएम) के माध्यम से अन्य संबंधित एजेंसियों और विशेष इकाइयों के बीच त्वरित समन्वय स्थापित किया जाएगा। सीआईडी का मानना है कि इस बहुआयामी और सख्त रणनीति से न केवल लापता लोगों की बरामदगी दर बढ़ेगी, बल्कि राज्य में सक्रिय मानव तस्करी के संगठित गिरोहों की कमर भी पूरी तरह टूट जाएगी।