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देहरादून नगर निगम चुनाव विवाद: बालावाला वार्ड से पार्षद प्रशांत खरोला के निर्वाचन को हाईकोर्ट में चुनौती, नोटिस जारी

editor
  • Tapas Vishwas
  • November 06, 2026 12:11 PM
Dehradun Municipal Corporation election dispute: Election of Councilor Prashant Kharola from Balawala ward challenged in High Court; notice issued.

उत्तराखंड के उच्च न्यायालय ने देहरादून नगर निगम के वार्ड नंबर 98 (बालावाला) से निर्वाचित पार्षद प्रशांत खरोला के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे प्रतिद्वंदी आशीष खत्री द्वारा दाखिल अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने निर्वाचित पार्षद प्रशांत खरोला को औपचारिक नोटिस जारी कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने देहरादून जिला न्यायालय से इस चुनाव याचिका से जुड़ा संपूर्ण रिकॉर्ड भी तलब कर लिया है। मामले की अगली सुनवाई के लिए चार सप्ताह बाद की तिथि निर्धारित की गई है।

नगर निकाय चुनाव में प्रत्याशियों की ओर से दाखिल किए जाने वाले शपथ पत्रों की पारदर्शिता एक बार फिर सवालों के घेरे में है। देहरादून नगर निगम के वार्ड नंबर 98 बालावाला से निर्वाचित पार्षद प्रशांत खरोला के निर्वाचन को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। चुनाव में महज 26 मतों से हारने वाले प्रतिद्वंद्वी आशीष खत्री की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रशांत खरोला को नोटिस जारी किया है। अदालत ने उनसे चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही देहरादून जिला न्यायालय से चुनाव याचिका से संबंधित पूरा रिकॉर्ड भी तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। दरअसल, देहरादून नगर निगम के चुनाव में बालावाला वार्ड से प्रशांत खरोला निर्वाचित हुए थे। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी आशीष खत्री को केवल 26 मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। चुनाव परिणाम आने के बाद आशीष खत्री ने प्रशांत खरोला के निर्वाचन को चुनौती देते हुए जिला न्यायालय में चुनाव याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि चुनाव के दौरान प्रशांत खरोला की ओर से प्रस्तुत शपथ पत्र में गलत जानकारी दी गई। इसमें विभिन्न तिथियों को लेकर भिन्नता होने के साथ-साथ अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की जानकारी भी कथित रूप से छिपाई गई। आशीष खत्री ने अपनी याचिका में उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 45 का हवाला दिया था, जिसे उत्तराखंड में वर्ष 2002 में संशोधित किया गया था। उनका तर्क था कि इस प्रावधान के तहत चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को अपने खिलाफ लंबित ही नहीं, बल्कि समाप्त हो चुके आपराधिक मुकदमों की जानकारी भी घोषित करना अनिवार्य है। ऐसे में यदि किसी प्रत्याशी ने जानबूझकर आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई है तो उसकी पात्रता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। हालांकि, जिला जज देहरादून ने आशीष खत्री की चुनाव याचिका खारिज कर दी थी। जिला न्यायालय का कहना था कि आपराधिक मुकदमों की जानकारी छिपाने के आरोप के बावजूद यह साबित नहीं हुआ कि इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ। इसके अतिरिक्त याचिका अन्य तकनीकी आधारों पर भी निरस्त की गई थी। जिला न्यायालय के फैसले से असंतुष्ट आशीष खत्री ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपील में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि आपराधिक मुकदमों की जानकारी छिपाने के मामले में चुनाव परिणाम प्रभावित होने की शर्त प्रासंगिक नहीं रह जाती और ऐसी स्थिति में प्रत्याशी की अयोग्यता का प्रश्न उठ सकता है। अब हाईकोर्ट की ओर से नोटिस जारी किए जाने और जिला न्यायालय से पूरा रिकॉर्ड तलब किए जाने के बाद इस मामले ने नया मोड़ ले लिया है। आगामी सुनवाई में दोनों पक्षों के तर्क और निचली अदालत के अभिलेख महत्वपूर्ण होंगे। हालांकि, फिलहाल हाईकोर्ट ने निर्वाचन रद्द करने या पार्षद को अयोग्य घोषित करने का कोई आदेश नहीं दिया है। ऐसे में अब सबकी निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि शपथ पत्र में कथित अनियमितताओं को लेकर न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।


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