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तारीखों और कुछ घटनाओं के हेरफेर के बावजूद धुरंधर हुई ब्लॉकबस्टर,अल्फा प्रमोशन के बाद भी ढूंढ रही है दर्शक!धुरंधर के आगे फीकी पड़ी अल्फा

editor
  • Kanchan Verma
  • July 06, 2026 05:07 AM
Despite the manipulation of dates and certain events, *Dhurandhar* became a blockbuster, whereas *Alpha* is still struggling to find an audience even after its promotions! *Alpha* pales in comparison to *Dhurandhar*.

सिनेमा का सबसे बड़ा प्रमोशन आखिर होता क्या है? करोड़ों के इवेंट, दर्जनों इंटरव्यू, सोशल मीडिया कैंपेन, कॉमेडियन के साथ वीडियो, टेनिस मैच, प्लैंक चैलेंज और वायरल रील्स? या फिर सिर्फ एक अच्छी कहानी?
इसी सवाल के बीच खड़ी है आलिया भट्ट और शरवरी वाघ की 'अल्फा', जिसे यशराज स्पाई यूनिवर्स की  बड़ी पेशकश बताया गया,और फिल्म धुरंधर को टक्कर देने के दावे के साथ रिलीज भी किया गया,लेकिन अब फिल्म और फिल्म की चर्चा देखकर लगता है कि मामला थोड़ा उल्टा पड़ गया है।

अल्फा की तुलना लगातार 'धुरंधर' से हो रही है। वही धुरंधर जिसे रिलीज के बाद अलग से प्रचार की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। न कॉमेडियनों के साथ प्रमोशनल वीडियो, न प्लैंक चैलेंज, न "अल्फा बनने" के टास्क। लोगों ने ही फिल्म का प्रचार कर दिया। कंटेंट इतना मजबूत निकला कि दर्शक खुद उसकी मार्केटिंग टीम बन गए।
इधर अल्फा का हाल यह है कि प्रमोशन के नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। पहले समय रैना के साथ वीडियो, फिर अनुभव सिंह बस्सी के साथ टेनिस मैच। टेनिस जीत गए तो अल्फा, हार गए तो बस्सी। फिर डार्ट बोर्ड पर निशाना लगाओ, फिर प्लैंक करो, फिर टीम अल्फा के सदस्य बन जाओ।
दर्शकों का सवाल सीधा है, क्या स्पाई एजेंट बनने की ट्रेनिंग अब RAW अकादमी में नहीं, यूट्यूब कंटेंट स्टूडियो में होने लगी है?
बस्सी खुद वीडियो में कह देते हैं, "मुझे बनना ही नहीं अल्फा।" और सच पूछिए तो सोशल मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी कुछ ऐसा ही कहता दिखाई दे रहा है। कई यूजर्स एक लाइन में यशराज फिल्म्स के लिए लिख रहे हैं, "तुमसे न हो पाएगा।"
असल समस्या सिर्फ प्रमोशन नहीं है। समस्या यह है कि जिस फिल्म को धुरंधर के बरक्स खड़ा किया जा रहा था, वह अब उसी तुलना में कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
धुरंधर पर आरोप लगे कि उसने कुछ तारीखों और घटनाओं में सिनेमाई छूट ली, लेकिन दर्शकों का कहना है कि कम से कम उसकी आत्मा कहानी में थी। अल्फा में तो कई बार लगता है कि कहानी बाद में लिखी गई और स्पाई यूनिवर्स का विस्तार पहले तय कर लिया गया।
फिल्म की कमियां भी सोशल मीडिया पर खुलकर गिनाई जा रही हैं। किसी ने इसे दो स्टार, किसी ने ढाई स्टार दिए हैं। कुछ दर्शकों का कहना है कि फिल्म कई जगह दूसरे सिनेमाई ब्रह्मांडों की याद दिलाती है, लेकिन अपनी अलग पहचान नहीं बना पाती।
कहीं ऐसे किरदार हैं जो बिना देखे सब जान लेते हैं, कहीं वैज्ञानिक प्रयोग हैं जो सुपर सोल्जर प्रोग्राम की याद दिलाते हैं, कहीं सेना की कार्यप्रणाली इतनी सतही दिखाई गई है कि दर्शक कहानी से जुड़ने के बजाय सवाल पूछने लगते हैं।
एक दृश्य में माइन ट्रैप इतना संवेदनशील है कि पैर हटाते ही विस्फोट हो सकता है, लेकिन उसी क्षेत्र में भारी लकड़ियां गिरती रहती हैं और कुछ नहीं होता। स्पेन में पंजाबी गाने, भारत में अंग्रेजी गीत, आधी कहानी संवादों में सुनाई जाती हुई और सेना के अस्पतालों का ऐसा चित्रण, जिसे देखकर लोग पूछ रहे हैं कि क्या फिल्म बनाने से पहले किसी सैन्य प्रतिष्ठान का दौरा भी किया गया था?
महिला प्रधान स्पाई फिल्म बनाने की कोशिश निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन मजबूत महिला किरदार और सिर्फ एक्शन करती महिला किरदार में फर्क होता है। दर्शकों को ताकत के साथ गहराई भी चाहिए। और यहीं जाकर तुलना फिर धुरंधर से होने लगती है।
एक तरफ वह फिल्म, जिसमें तारीखों का हेरफेर किया गया घटनाओं को आगे पीछे दिखाया गया लेकिन फिर भी दर्शकों ने फिल्म को कंधों पर उठा लिया और प्रचार अपने आप हो गया। दूसरी तरफ अल्फा, जो रिलीज से पहले ही लगातार समझाने में लगी है कि आखिर दर्शकों को इसे क्यों देखना चाहिए।
कहते हैं, अच्छी फिल्म को मार्केटिंग की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन महान फिल्म की मार्केटिंग उसके दर्शक कर देते हैं।
शायद यही वजह है कि आज सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली टिप्पणी यही है...
"धुरंधर ने बिना शोर किए दर्शक जीत लिए, और अल्फा इतना शोर मचा रही है कि कहानी की आवाज ही सुनाई नहीं दे रही।"
और हां, अगर किसी स्पाई फिल्म का प्रमोशन टेनिस, डार्ट बोर्ड और प्लैंक चैलेंज से करना पड़ जाए, तो दर्शकों को यह पूछने का पूरा हक है कि आखिर फिल्म में भरोसा ज्यादा है या प्रमोशन टीम में?


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