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झारखंड में धान की सीधी बुआई बनी किसानों के लिए वरदान! कम बारिश में भी लहलहाएगी फसल,बदल रही खेती की तस्वीर

editor
  • Tapas Vishwas
  • July 28, 2026 05:07 AM
Direct seeding of paddy proves to be a boon for farmers in Jharkhand! Crops will thrive even with scanty rainfall; the face of farming is changing.

रांची। बदलते मौसम, अनियमित मानसून और बढ़ती खेती लागत के बीच झारखंड के किसानों के लिए धान की सीधी बुआई (डायरेक्ट सीडेड राइस-DSR) तकनीक नई उम्मीद बनकर उभर रही है। कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने वाली इस आधुनिक तकनीक को कृषि विभाग और रामकृष्ण मिशन के कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से रांची के मांडर प्रखंड स्थित कैम्बो पंचायत में 10 एकड़ क्षेत्र में प्रायोगिक तौर पर अपनाया गया है। इसका उद्देश्य किसानों को पारंपरिक धान रोपाई के बजाय आधुनिक खेती की ओर प्रेरित करना है।

झारखंड में खरीफ सीजन के दौरान लगभग 18 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है। ऐसे में हर तीन-चार साल में सामान्य से कम बारिश होने पर सबसे अधिक नुकसान धान उत्पादकों को उठाना पड़ता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए कृषि विभाग डीएसआर तकनीक को भविष्य की खेती मान रहा है। जिला कृषि पदाधिकारी राम शंकर प्रसाद सिंह के अनुसार, इस तकनीक में धान की नर्सरी तैयार कर रोपाई करने की जरूरत नहीं पड़ती। बीज को सीधे खेत में मशीन या विशेष उपकरण की सहायता से बो दिया जाता है। थोड़ी नमी मिलने पर बीज अंकुरित होकर पौधे में बदल जाते हैं। इससे समय, पानी और श्रम—तीनों की बचत होती है। उन्होंने बताया कि पारंपरिक धान रोपाई में खेतों में लगातार पानी भरकर रखना पड़ता है, जबकि डीएसआर तकनीक में सिंचाई की आवश्यकता काफी कम होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे 15 से 30 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है। यही कारण है कि कम बारिश और गिरते भूजल स्तर वाले क्षेत्रों के लिए यह तकनीक बेहद उपयोगी मानी जा रही है। हालांकि, डीएसआर तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती खरपतवार (घास-फूस) को माना जाता रहा है। लेकिन कृषि विभाग का कहना है कि बीज बोने के तुरंत बाद खरपतवारनाशी (वीडिसाइड) का छिड़काव कर इस समस्या का प्रभावी समाधान किया जा सकता है। इससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक से न केवल मजदूरी का खर्च कम होता है, बल्कि खेती समय पर पूरी होने से किसान अगली फसल भी जल्दी ले सकते हैं। पारंपरिक पद्धति में जहां नर्सरी तैयार करने और रोपाई में कई सप्ताह लग जाते हैं, वहीं DSR में बुआई का कार्य तेजी से पूरा हो जाता है। झारखंड के कृषि निदेशक विद्यानंद शर्मा 'पंकज' ने बताया कि राज्य के सिमडेगा और पश्चिम सिंहभूम के कुछ किसान पहले से इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन पूरे राज्य में इसका विस्तार अभी नहीं हो पाया है। विभाग अब अधिक से अधिक किसानों को इस आधुनिक पद्धति से जोड़ने के लिए जागरूकता अभियान और प्रदर्शन कार्यक्रम चला रहा है। देश के पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पहले ही DSR तकनीक को व्यापक सफलता मिल चुकी है। अब झारखंड में भी इसे कृषि क्षेत्र में बदलाव की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधन और बढ़ती उत्पादन लागत के दौर में धान की सीधी बुआई किसानों की आय बढ़ाने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने का प्रभावी विकल्प साबित हो सकती है।


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