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Divorce:क्रिस्चियन कम्युनिटी में तलाक को लेकर केरल हाईकोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला!कोर्ट ने खत्म किया ईसाईयों का ये नियम!सेम मैरिज कोड पर सरकार को भी दी गंभीरता से सोचने की नसीहत

editor
  • Kanchan Verma
  • December 11, 2022 06:12 AM
Divorce:Kerala High Court gave a historic decision regarding divorce in the Christian community! The court abolished this rule of Christians! The government was also advised to think seriously on the same marriage code

भारत/केरल:11/12/2022

कैथोलिक चर्च' तलाक़ को सही नहीं मानती. शादी के व़क्त ली गई शपथ में 'मौत होने तक साथ रहने' की बात कही जाती है,लेकिन अगर किसी दंपत्ति के बीच ऐसे हालात बन जाएं कि वो किसी भी कीमत पर साथ नहीं रहना चाहते हों, तो 'कैथोलिक चर्च' उनकी शादी को 'नल एंड वॉएड' यानि रद्द करने का तरीका बताती है।


केरल हाईकोर्ट में इसी तरह एक ईसाई दंपत्ति के तलाक का मामला आया तो कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में तलाक अधिनियम 1869 की धारा 10ए को निरस्त कर दिया है। इस अधिनियम में आपसी सहमति से तलाक के लिए अर्जी देने से पहले पति-पत्नी को कम से कम एक साल तक अलग-अलग रहना अनिवार्य था।
इसे कानून को अदालत ने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना है और इस धारा को असंवैधानिक बताया है। इसके साथ ही ईसाइयों के लिए इस प्रोविजन को निरस्त करते हुए अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार को भारत में सेम मैरिज कोड पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पति-पत्नी में नहीं बनती और वो आपसी सहमति ले तलाक लेना चाहते हैं, तो उन्हें एक साल तक अलग-अलग रहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। अदालत ने शुक्रवार (8 दिसंबर) को कहा कि, 'भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10 ए के तहत आपसी सहमति से तलाक याचिका दाखिल करने के लिए एक साल या उससे ज्यादा समय तक अलगाव की न्यूनतम अवधि का निर्धारण मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और यह पूर्णतः असंवैधानिक है।'

अदालत ने इस मामले में दंपत्ति के एक साल अलग-अलग रहने की शर्त को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति ए मुहम्मद मुस्ताक और न्यायमूर्ति शोबा अन्नम्मा एपेन की खंडपीठ ने कहा कि, 'अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि नागरिकों की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करती है, इस मामले में ईसाई नागरिक जिन पर भारतीय तलाक अधिनियम लागू होता है।' अदालत ने आगे कहा कि, 'हमारा दृढ़ विचार है कि जब किसी की इच्छा के मुताबिक कार्य करने की आज़ादी छीन ली जाती है, तो इस प्रकार के प्रतिबंधों के परिणामों को सुरक्षित करने की किसी प्रक्रिया के बगैर, कानून दमनकारी हो जाएगा।'

बता दें कि, केरल हाई कोर्ट ने यह फैसला एक युवा ईसाई जोड़े की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। इस कपल की शादी इस साल की शुरुआत में ईसाई रीति-रिवाजों के मुताबिक हुई थी। इस मामले में पति की आयु 30 वर्ष और पत्नी की आयु 28 वर्ष है। दंपत्ति का कहना है कि वे मानते हैं कि उनकी शादी एक गलती थी। वे शादी के चार महीने बाद ही एक पारिवारिक अदालत गए थे, जहां न्यायालय ने मामले की सुनवाई से इनकार कर दिया था। फैमली कोर्ट ने तलाक की याचिका के लिए एक साल अलग रहने के नियम का हवाला देते हुए सुनवाई करने से इंकार कर दिया था। जिसके बाद ये दंपत्ति उच्च न्यायालय गया और उन्होंने वहां तलाक के लिए एक साल अलग रहने के नियम को निरस्त करने की मांग की।

अब तक कैसे होता आया है ईसाईयों में तलाक ?

शादी रद्द करवाने के लिए दंपत्ति को इसकी वजहों का एक आवेदन चर्च में देना होता है. चर्च सबसे पहले बातचीत के ज़रिए उनमें सुलह करवाने की कोशिश करता है

सुलह ना होने की सूरत में, पति और पत्नी को छह महीने से एक साल की अवधि तक अलग रहने के लिए कहा जाता है इस बीच भी बात ना सुलझे तो इसके बाद चर्च के 'डॉओसीस कोर्ट' में सुनवाई शुरू होती है।


चर्च की नज़र में दो प्रमुख बातों का उल्लंघन साबित होने पर शादी रद्द कर दी जा सकती है - अगर शादी बिना रज़ामंदी के हुई हो या शादी को शारीरिक संबंध बनाकर मुकम्मल ना किया गया हो.

सुनवाई के दौरान घरेलू हिंसा, 'अडल्ट्री' यानि व्यभिचार, या दो धर्मों के बीच हुई शादी में धर्म का पालन ना करने दिया जाने जैसी वजहों को भी शादी रद्द करने की वजह के तौर पर सुना जाता है.
वहीं क़ानूनी तलाक़ और चर्च में पहली शादी रद्द होने के बाद ही चर्च में दूसरी शादी हो सकती है. पर अगर ईसाई धर्म का व्यक्ति दूसरी शादी चर्च में ना करना चाहे (अदालत में करना चाहे) तो पहली शादी चर्च में रद्द करवाना अनिवार्य नहीं है.


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