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उत्तराखंड का पामीर 'दूधातोली' बना राष्ट्रभक्ति का गवाह: न जयंती न पुण्यतिथि,12 जून को इसलिए कोदियाबगड़ उमड़े तीन जिलों के ग्रामीण

editor
  • Tapas Vishwas
  • June 13, 2026 10:06 AM
'Dudhatoli'—the 'Pamir of Uttarakhand'—becomes a witness to patriotism: Neither a birth anniversary nor a death anniversary—here is why villagers from three districts flocked to Kodiyabagar on June 12.

गैरसैंण। उत्तराखंड के पामीर के नाम से विख्यात दूधातोली के रमणीक कोदियाबगड़ बुग्याल में 'पेशावर कांड' के महानायक और महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की याद में वार्षिक स्मृति मेले का भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक मौके पर चमोली, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों के सीमांत गांवों से सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण दुर्गम रास्तों को पार कर राष्ट्रभक्ति के जज्बे के साथ पहुंचे। ग्रामीणों ने मध्य हिमालय की गोद में स्थित वीर सेनानी और महान समाज सुधारक की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी।आमतौर पर मेले महापुरुषों की जयंती या पुण्यतिथि पर आयोजित होते हैं, लेकिन 12 जून का यह दिन उत्तराखंड के इतिहास में गहरे स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक है। दरअसल, यह वही ऐतिहासिक तारीख है जब ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत करने पर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को कड़ी सजा सुनाई गई थी।

इतिहास के पन्नों को पलटें तो 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रसिद्ध 'रॉयल गढ़वाल राइफल्स' के हवलदार मेजर चंद्र सिंह भंडारी ने अंग्रेजों का वह क्रूर आदेश मानने से इनकार कर दिया था, जिसमें निहत्थे पठानी स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने को कहा गया था। इस देशभक्ति के बदले 12 जून 1930 को एबटाबाद मिलिट्री कोर्ट (वर्तमान पाकिस्तान) ने उनका कोर्ट मार्शल कर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता का आलम यह था कि चंद्र सिंह गढ़वाली की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई और उनकी सैनिक वर्दी को उनके शरीर से काट-काटकर अलग किया गया। उनके साथ 62 अन्य गढ़वाली सैनिकों का भी कोर्ट मार्शल हुआ। गढ़वाली जी ने 11 साल का लंबा समय देश की अलग-अलग जेलों में काटा, जहां उनकी मुलाकात नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अन्य क्रांतिकारी राजबंदियों से हुई। इस अदम्य साहस के बाद ही वे 'वीर चंद्र सिंह गढ़वाली' के नाम से अमर हो गए। पौड़ी गढ़वाल के मासौं गांव (थलीसैंण) के रहने वाले गढ़वाली जी का सामाजिक सरोकारों और पहाड़ों के पशुपालकों से गहरा लगाव था। सन् 1979 में अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने इच्छा जताई थी कि उनकी समाधि दूधातोली के कोदियाबगड़ में बनाई जाए। समुद्रतल से 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह बुग्याल कभी सैकड़ों पशुपालकों का पसंदीदा ठिकाना और दुग्ध उत्पादन का केंद्र था, जिसके कारण इसे 'दूधातोली' (दूध का बर्तन) कहा गया। गढ़वाली जी की इच्छानुसार ग्रामीणों ने यहाँ उनकी समाधि बनाई और तब से हर साल चौमास (बरसात के चार महीने) की शुरुआत में पशुपालक और स्थानीय लोग अपनी परंपरा के तहत यहाँ मेले का आयोजन करते आ रहे हैं। वक्त के साथ पशुपालन कम होने से इस ऐतिहासिक मेले की रंगत फीकी पड़ने लगी थी, जिसे बचाने के लिए अब स्थानीय लोगों और गैरसैंण नगर पंचायत ने कमर कस ली है। नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी के विशेष आह्वान पर इस वर्ष मेले को नया रूप दिया गया। समाधि स्थल पर पहले से स्थापित जीर्ण-शीर्ण मूर्ति को हटाकर एक नई और भव्य मूर्ति स्थापित की गई। खड़ी चढ़ाई और दुर्गम रास्तों को पार कर कोदियाबगड़ पहुंचे ग्रामीणों ने गर्व के साथ राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराया और नई मूर्ति का अनावरण किया। इस मौके पर विभिन्न गांवों से आईं महिला मंगल दलों ने पारंपरिक परिधानों में देशभक्ति से ओत-प्रोत शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए, जिससे पूरा बुग्याल 'वीर चंद्र सिंह गढ़वाली अमर रहें' के नारों से गूंज उठा। मेले के पुनरुद्धार में जुटे नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी ने कहा, "गढ़वाली जी का जीवन अद्वितीय साहस का प्रतीक है। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर उन्होंने मानवता की मिसाल पेश की थी। उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारा सामूहिक दायित्व है। हालांकि, इस ऐतिहासिक स्थल को लेकर राज्य सरकारों की उदासीनता साफ नजर आती है। अब तक केवल पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ही एकमात्र ऐसे राजनेता रहे हैं, जो अपने कार्यकाल में इस दुर्गम स्थल पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। सरकारों की इस गंभीरता की कमी के बावजूद, सीमांत क्षेत्र के ग्रामीण आज भी अपने सीमित संसाधनों के दम पर इस ऐतिहासिक विरासत और देश के महानायक की यादों को जिंदा रखे हुए हैं।


 


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