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नैनीताल में पारंपरिक उल्लास के साथ बोया गया हरेला! लोकगीतों और झोड़ा नृत्य के बीच प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश

editor
  • Awaaz Desk
  • July 06, 2026 02:07 PM
'Harela' sown with traditional fervor in Nainital! A message of nature conservation conveyed amidst folk songs and the 'Jhora' dance.

नैनीताल। प्रकृति, पर्यावरण और समृद्ध लोकसंस्कृति का प्रतीक हरेला पर्व नैनीताल में पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आज महिलाओं ने पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा धारण कर शगुन आखर और मांगलिक गीतों के बीच हरेला बोया। पूरे आयोजन में उत्तराखंड की लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति संरक्षण का सुंदर संगम देखने को मिला। हरेला महोत्सव का शुभारंभ आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती ने पारंपरिक विधि-विधान के साथ किया। इस दौरान दिगारो की पूजा-अर्चना संपन्न हुई और आषाढ़ माह की परंपरा के अनुसार सात प्रकार के अनाजों के बीज एक साथ बोए गए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन बीजों से तैयार होने वाले हरेले को दस दिन बाद श्रावण मास के प्रथम दिन काटा जाता है। उत्तराखंड में हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, हरियाली और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। हरेला बोने की रस्म पूरी होने के बाद महिलाओं ने पारंपरिक झोड़ा लोकनृत्य प्रस्तुत किया और लोकगीतों की मधुर धुनों पर पर्व का उल्लास मनाया। पूरे आयोजन में उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं की जीवंत झलक देखने को मिली। इस अवसर पर लेक सिटी वेलफेयर की अध्यक्ष दीपा पांडे ने कहा कि हरेला पर्व हमारी संस्कृति, पर्यावरण और सामाजिक एकता का प्रतीक है। उन्होंने लोगों से अधिक से अधिक पौधारोपण करने तथा आने वाली पीढ़ियों को इस परंपरा से जोड़ने का आह्वान किया। आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती ने कहा कि हरेला जैसे पारंपरिक पर्व नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बीच लुप्त होती लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना समय की आवश्यकता है। ऐसे आयोजन न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी समाज को जागरूक करते हैं। कार्यक्रम में स्थानीय महिलाओं, सामाजिक संगठनों और गणमान्य नागरिकों की सक्रिय भागीदारी रही। आयोजन के माध्यम से प्रकृति संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।


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