सीने में खाईं 6 गोलियां, फिर भी पाक बंकर पर तिरंगा फहराकर अमर हुआ भोजपुर का यह लाल
भोजपुर। वीर कुंवर सिंह की ऐतिहासिक माटी भोजपुर का इतिहास वीरों की शहादत और शौर्य से भरा पड़ा है। इसी माटी के एक और जांबाज सपूत विद्यानंद सिंह ने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने अदम्य साहस, पराक्रम और देशभक्ति का परिचय देते हुए देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। 18 हजार फीट की बर्फीली ऊँचाई पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले इस वीर योद्धा ने सीने में 6 गोलियाँ खाने के बावजूद पाकिस्तानी बंकर पर तिरंगा फहराकर ही दम लिया।
भोजपुर जिले के संदेश थाना क्षेत्र स्थित छोटे से गांव पनपुरा में 12 जनवरी 1966 को जन्मे विद्यानंद सिंह एक साधारण किसान परिवार से थे। उनके पिता सकलदीप सिंह और माता लक्ष्मीना देवी थीं। परिवार में उनके चाचा स्व. चंद्रदीप सिंह और चचेरे भाई रामप्रसाद सिंह भारतीय सेना में तैनात थे। अपने घर के वीरों से प्रेरित होकर विद्यानंद ने भी सेना में जाने का संकल्प लिया और बिहार रेजिमेंट की पहली बटालियन के सदस्य बने। कारगिल युद्ध से ठीक पहले वे नागालैंड में तैनात थे, जहाँ उग्रवादियों के खिलाफ सफल ऑपरेशन चलाने के लिए उन्हें 'सेना मेडल' से सम्मानित किया गया था। 21 मई 1999 को जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तो विद्यानंद सिंह की टुकड़ी को द्रास और बटालिक सेक्टर की 18 हजार फीट ऊँची सामरिक चोटी को दुश्मनों के चंगुल से मुक्त कराने की जिम्मेदारी दी गई। यह चोटी राष्ट्रीय राजमार्ग और भारतीय सेना की सप्लाई लाइन के लिए बेहद अहम थी। 5 जून को चढ़ाई शुरू कर 6 जून की काली रात में भारतीय जांबाजों ने सीधी और खतरनाक पहाड़ियों को पार करते हुए पाकिस्तानी बंकरों पर अचानक धावा बोल दिया। आमने-सामने की खूनी जंग में भारतीय वीरों ने दुश्मनों को खदेड़कर बंकर पर तिरंगा लहरा दिया। जीत के बाद दुश्मन की ओर से अचानक अंधाधुंध गोलीबारी शुरू हो गई। इस हमले में विद्यानंद सिंह के सीने और शरीर में 6 गोलियां लगीं। गंभीर रूप से घायल होने और असहनीय दर्द के बावजूद इस जांबाज ने अपनी मशीन गन नहीं छोड़ी और अकेले ही 6 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। जब तक मेडिकल टीम पहुँचती, 7 जून 1999 को यह महान लाल देश के लिए वीरगति को प्राप्त हो चुका था। 2003 में शहीद के पैतृक गांव पनपुरा में उनका स्मारक बनाया गया, जहाँ हर साल पूरा जिला उनकी शहादत को नमन करता है। वर्तमान में उनकी पत्नी पार्वती देवी अपने छोटे बेटे रविशंकर के साथ हजारीबाग में रहती हैं। प्रशासन द्वारा आवंटित पेट्रोल पंप 'कारगिल प्वाइंट' और एक सोशल फाउंडेशन के जरिए शहीद की स्मृति को सहेजा जा रहा है। आखिरी सांस तक दुश्मन का काल बनने वाले बिहार के इस लाल के बलिदान को देश हमेशा नमन करेगा।