कच्चे तेल में ऐतिहासिक गिरावट: अमेरिका-ईरान युद्धविराम से कीमतों में 18 फीसदी की भारी कमी, भारत के लिए बड़ी राहत
नई दिल्ली। वैश्विक बाजार और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बुधवार को एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई। अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम (सीजफायर) की घोषणा के तत्काल बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में पिछले छह वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। एक समय जो कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया था, वह बुधवार को करीब 18 प्रतिशत तक लुढ़क गया। इस ऐतिहासिक गिरावट ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को लेकर बनी चिंताओं को फिलहाल शांत कर दिया है। मंगलवार को कच्चे तेल की कीमत 109.27 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थी। बुधवार को कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड 19.26 डॉलर यानी 17.62 प्रतिशत गिरकर 90.01 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर पर आ गया। हालांकि, बाद में कुछ सुधार के साथ भाव 94.27 डॉलर प्रति बैरल के आसपास टिके। गौरतलब है कि जिस दिन ईरान और अमेरिका के बीच तनाव शुरू हुआ था, उस दिन तेल की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल थी। युद्ध के बाद से कीमतें लगातार बढ़ती गईं, लेकिन सीजफायर की खबर ने इस पर ब्रेक लगा दिया है।
बाजार में आई इस गिरावट की मुख्य वजह ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची का वह संकेत है, जिसमें उन्होंने कहा है कि युद्धविराम की अवधि के दौरान 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से तेल टैंकरों के आवागमन की अनुमति दी जाएगी। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के करीब पांचवें हिस्से के लिए जीवन रेखा माना जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को दो सप्ताह के लिए स्थगित करने के फैसले ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। घरेलू बाजार में भी इसका जोरदार असर दिखा। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर अप्रैल महीने के वायदा अनुबंध का भाव सुबह 6 प्रतिशत टूटकर खुला और देखते ही देखते 1,894 रुपये यानी 17.75 प्रतिशत फिसलकर 8,775 रुपये प्रति बैरल पर आ गया। मंगलवार को यही भाव 10,990 रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर था। वहीं मई महीने का अनुबंध भी 15 प्रतिशत की गिरावट के साथ 'लोअर सर्किट' को छू गया। कच्चे तेल की कीमतों में आई यह कमी भारत के लिए संजीवनी के समान है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है, इसलिए कीमतों में गिरावट से न केवल विदेशी मुद्रा भंडार की बचत होगी, बल्कि आयात बिल में भी बड़ी कटौती होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल सस्ता होने से डॉलर की मांग कम होगी, जिससे वैश्विक बाजार में भारतीय रुपया और अधिक मजबूत होगा।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
पेट्रोल-डीजल: यदि कीमतें 100 डॉलर के नीचे बनी रहती हैं, तो आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम कम हो सकते हैं।
महंगाई पर लगाम: परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत घटने से खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा के सामानों की कीमतें कम होने की उम्मीद है।
विमानन क्षेत्र: एयरलाइंस कंपनियों के लिए एटीएफ (हवाई ईंधन) सस्ता होगा, जिससे हवाई किराए में कमी आ सकती है।
वेस्टेड फाइनेंस के सीईओ विराम शाह के अनुसार, कीमतें 100 डॉलर से नीचे आने के बावजूद आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह सामान्य होने में कई हफ्ते या महीने लग सकते हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत तभी तक स्थायी है जब तक युद्धविराम बना रहता है। यदि सीजफायर को लेकर कोई नकारात्मक खबर आती है, तो कीमतें फिर से 100 डॉलर के पार जा सकती हैं। फिलहाल, यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े वरदान से कम नहीं है।