हॉर्मुज संकट का असर: पेट्रोलियम से बनने वाली दवाओं पर मंडराया खतरा, बढ़ सकती हैं कीमतें
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित अवरोध का असर अब भारत के दवा उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। केंद्र सरकार भले ही यह दावा कर रही हो कि देश में जरूरी दवाओं का चार से पांच महीने का पर्याप्त भंडार मौजूद है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति लंबी चली तो दवाओं की आपूर्ति और कीमतों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
दरअसल, आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली कई जरूरी दवाएं जैसे पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और डायबिटीज की दवाएं पेट्रोकेमिकल उत्पादों से तैयार होती हैं। शनाका अंस्लेम परेरा के अनुसार पैरासिटामोल और इबुप्रोफेन जैसी दवाएं पूरी तरह पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल से बनती हैं, जबकि डायबिटीज की प्रमुख दवा मेटफॉर्मिन भी काफी हद तक इसी पर निर्भर है। इन दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाला नैफ्था और अन्य रसायन बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों से इसी समुद्री मार्ग के जरिए आते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हॉर्मुज क्षेत्र में बढ़ते खतरे के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, जिससे कच्चे माल की सप्लाई चेन बाधित हो रही है। राजीव नाथ ने बताया कि इस संकट के चलते प्लास्टिक जैसे कच्चे माल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है, जबकि गैस और ऊर्जा लागत भी दोगुनी हो गई है। इसका सीधा असर मेडिकल उपकरणों और दवाओं की लागत पर पड़ रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत में दवा निर्माण के लिए जरूरी मेथनॉल का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आता है। अगर सप्लाई बाधित होती है तो दवा कंपनियों के पास मौजूद तैयार दवाओं का स्टॉक तेजी से खत्म हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक-दो सप्ताह की देरी तो संभाली जा सकती है, लेकिन लंबे समय तक संकट रहने पर उत्पादन ठप होने की आशंका है। आयुष चौहान के मुताबिक, वैश्विक सप्लाई चेन में रुकावट का असर अल्पकाल में दवाओं की उपलब्धता पर दबाव डाल सकता है, खासकर एंटीबायोटिक्स, डायबिटीज और इंजेक्शन जैसी जरूरी दवाओं पर। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और अस्पताल वैकल्पिक आपूर्ति के जरिए इससे निपटने की तैयारी कर रहे हैं। वहीं, फेडरेशन ऑफ फार्मा एंटरप्रेन्योर्स ने केंद्र सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन का कहना है कि कच्चे माल (API) और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में 20 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है, जिससे दवा उद्योग पर भारी दबाव पड़ रहा है। पीवीसी, एल्यूमीनियम फॉयल और पैकेजिंग सामग्री की लागत में भी तेजी आई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. तमोरिश कोल का मानना है कि भारत के पास इस तरह के संकट से निपटने की क्षमता है, लेकिन लंबे समय में देश को आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की जरूरत है। फिलहाल विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि घबराकर दवाओं का अनावश्यक भंडारण न करें और डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही दवाओं का उपयोग करें। आने वाले समय में यदि स्थिति नहीं सुधरी तो दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी और कुछ दवाओं की कमी का सामना करना पड़ सकता है।