यूएनएससी में भारत का बड़ा एलान: फिलिस्तीन की मदद के लिए देगा 25 लाख डॉलर,गाजा में स्थायी युद्धविराम का किया समर्थन
नई दिल्ली। वैश्विक मंच पर शांति और मानवता का पुरजोर समर्थन करते हुए भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक बड़ी पहल की है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) संकट पर आयोजित एक उच्च स्तरीय चर्चा के दौरान भारत ने इस्राइल-फिलिस्तीन संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा कि वह गाजा में तत्काल और स्थायी युद्धविराम का पूरी तरह समर्थन करता है। इसके साथ ही, युद्ध की विभीषिका झेल रहे फिलिस्तीनी शरणार्थियों की मदद के लिए भारत ने 25 लाख अमेरिकी डॉलर (करीब 20 करोड़ रुपये से अधिक) की वित्तीय सहायता देने का बड़ा एलान किया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने परिषद को संबोधित करते हुए कहा कि गाजा में इस वक्त मानवीय स्थिति बेहद गंभीर और चिंताजनक है, जिस पर वैश्विक समुदाय को तत्काल ध्यान देने और राहत सामग्री पहुंचाने की आवश्यकता है।
भारत ने फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की राहत और कार्य एजेंसी को जल्द ही 25 लाख डॉलर देने की घोषणा की है। यह भारत की ओर से दिए जाने वाले वार्षिक 50 लाख डॉलर के कुल योगदान की पहली किस्त होगी, जिसका इस्तेमाल वहां विकास और राहत कार्यों के लिए किया जाएगा। भारत ने अपने संबोधन में न केवल फिलिस्तीन, बल्कि पड़ोसी देशों लेबनान और यमन के हालातों पर भी बेबाक राय रखी। भारत ने मांग की कि लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का हर हाल में सम्मान होना चाहिए। राजदूत पर्वतनेनी ने लेबनान में तैनात संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल में शामिल भारतीय शांति रक्षक सैनिकों की सुरक्षा का मुद्दा बेहद मुस्तैदी से उठाया और कहा कि उन्हें किसी भी स्थिति में निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। यमन के संदर्भ में भारत ने व्यापारिक जहाजों और समुद्री नौवहन पर होने वाले हमलों की कड़ी निंदा की। भारत ने लाल सागर और अदन की खाड़ी में सुरक्षा बनाए रखने को एक साझा अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बताया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के दशकों पुराने और ढर्रे पर चल रहे सुरक्षा परिषद के ढांचे में आमूल-चूल बदलाव की वकालत की। राजदूत पर्वतनेनी ने कहा कि फिलिस्तीन मुद्दा आज भी पुराने और अप्रासंगिक मध्यस्थता ढांचों से घिरा हुआ है, जबकि आज की गाजा शांति योजना की जमीनी वास्तविकताएं बिल्कुल अलग हैं। भारत ने वैश्विक नेताओं को याद दिलाया कि किसी भी युद्ध या संघर्ष में सबसे बड़ा नुकसान हमेशा मासूम महिलाओं और बच्चों को उठाना पड़ता है। इसलिए, दुनिया के विवादों को सुलझाने के लिए 'मानव-केंद्रित' दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि दुनिया भर में जारी युद्ध और अथाह मानवीय पीड़ा के कारण आज संयुक्त राष्ट्र अपनी वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता खोने के कगार पर खड़ा है। वैश्विक शांति के लिए सुरक्षा परिषद को वर्तमान समय की वास्तविकताओं के अनुरूप खुद को ढालना ही होगा।