दुबई में बेबसी के आंसू रो रहा झारखंड का लालचंद: पासपोर्ट खोया तो कंपनी ने निकाला,दाने-दाने को तरसे बगोदर के मजदूर ने लगाई वतन वापसी की गुहार
झारखंड के गरीब प्रवासी मजदूरों के बेहतर भविष्य का सपना एक बार फिर सात समंदर पार जाकर टूट गया है। विदेशों में श्रमिकों के फंसने और उनकी असमय मौत की दर्दनाक कड़ियों में अब एक और नया नाम गिरिडीह जिले का जुड़ गया है। बगोदर थाना क्षेत्र के तिरला गांव निवासी प्रवासी मजदूर लालचंद महतो इस वक्त दुबई में बंधक जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। भीषण आर्थिक तंगी की मार झेल रहे लालचंद अब सिर्फ अपने वतन और घर लौटना चाहते हैं, लेकिन जरूरी दस्तावेजों के खो जाने के कारण उनकी घर वापसी पर कानूनी ताला लग गया है। इस बीच, झारखंड में उनके बिलखते परिवार ने केंद्र और राज्य सरकार से लालचंद की सुरक्षित और त्वरित वतन वापसी के लिए हाथ जोड़कर गुहार लगाई है।
लालचंद महतो की पत्नी ने आंखों में आंसू लिए बेहद भावुक अपील करते हुए बताया कि उनके पति घर की कंगाली दूर करने और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की तलाश में दुबई गए थे। वहां वे एक कंपनी में बढ़ई (कारपेंटर) का काम करके किसी तरह पैसे कमा रहे थे। लेकिन कुछ दिन पहले काम के दौरान ही उनका पासपोर्ट कहीं गुम हो गया। पासपोर्ट खोने के बाद लालचंद को वहां कई प्रशासनिक और कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मदद करने के बजाय, जिस कंपनी के लिए उन्होंने खून-पसीना बहाया, उसने उन्हें नौकरी से बाहर निकाल दिया। फिलहाल दुबई की सड़कों पर उनकी हालत बद से बदतर हो चुकी है और उनके पास खाने तक के पैसे नहीं बचे हैं। लालचंद के परिवार पर मुसीबतों का यह कोई पहला पहाड़ नहीं है। परिजनों ने बताया कि लालचंद के पिता दशरथ महतो वर्ष 2013 में कमाने के लिए मुंबई गए थे और वहीं से लापता हो गए, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला। पिता के लापता होने के बाद से ही पूरा परिवार गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा था। ऐसे में घर के इकलौते कमाऊ सदस्य लालचंद के भी दुबई में फंस जाने से बूढ़ी मां, पत्नी और बच्चों के सामने भुखमरी और अंधेरा छा गया है। अब लालचंद का सही-सलामत घर लौट आना ही इस परिवार की आखिरी उम्मीद बची है। प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाने वाले प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सिकंदर अली ने इस मामले को लेकर विदेश मंत्रालय और झारखंड सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सिकंदर अली ने कड़े शब्दों में कहा कि यह कोई पहली घटना नहीं है। झारखंड के भोले-भाले मजदूरों को लालच देकर विदेश भेजा जाता है और वहां वे नरकीय जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं। इस मार्मिक घटना ने एक बार फिर राज्य में रोजगार के दावों की पोल खोल दी है। स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि लालचंद महतो को भारतीय दूतावास के जरिए 'इमरजेंसी सर्टिफिकेट' दिलाकर जल्द से जल्द झारखंड वापस लाया जाए।