किसाऊ बांध परियोजना में आएगी तेजी: गृह मंत्री अमित शाह आज दिल्ली में लेंगे महाबैठक,6 राज्यों के अफसर होंगे शामिल
देहरादून। दशकों से लंबित पड़ी देश की बेहद महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी 'किसाऊ बांध परियोजना' के काम में अब बुलेट ट्रेन की रफ्तार आने वाली है। केंद्रीय गृह मंत्रालय पिछले करीब छह महीनों से सीधे इस राष्ट्रीय परियोजना की निगरानी कर रहा है। इसी सिलसिले में आज यानी सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नई दिल्ली में सभी छह हितधारक (स्टेकहोल्डर) राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक हाई-लेवल बैठक करने जा रहे हैं। इसके ठीक बाद, आगामी 16 जून को गृह मंत्री शाह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ भी इस परियोजना को लेकर अंतिम दौर का मंथन करेंगे।
1940 के दशक में पहली बार परिकल्पित की गई इस बहुउद्देशीय परियोजना की संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) अब पूरी तरह तैयार हो चुकी है। वर्ष 2008 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था, लेकिन पर्यावरण संबंधी आपत्तियों और राज्यों के आपसी तालमेल की कमी से काम अटका रहा। अब तैयार हुई नई डीपीआर के मुताबिक, इस विशाल परियोजना पर करीब 15,000 करोड़ रुपये की लागत आएगी। डीपीआर को अंतिम एप्रूवल, पर्यावरणीय और अन्य आवश्यक स्वीकृतियों के लिए केंद्र सरकार को भेज दिया गया है। गृह मंत्रालय इस परियोजना को जल्द से जल्द धरातल पर उतारकर निर्माण कार्य शुरू कराना चाहता है। गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में होने वाली इस बड़ी समीक्षा बैठक में परियोजना से जुड़े सभी छह हितधारक राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के शीर्ष अधिकारी शामिल होंगे। उत्तराखंड की ओर से मुख्य सचिव आनंदबर्द्धन और यूजेवीएनएल के एमडी अनिल कुमार सिंह समेत कई वरिष्ठ अफसर इस बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली पहुंचे हैं। किसाऊ जलविद्युत परियोजना के पूरा होने से देश के पावर ग्रिड को 660 मेगावाट बिजली मिलेगी, जिससे उत्तराखंड को अकेले 350 मेगावाट बिजली का लाभ होगा। इसके साथ ही छह राज्यों के किसानों को सिंचाई के लिए प्रचुर मात्रा में पानी मिलेगा, जिससे दिल्ली समेत उत्तर भारत में जीवनदायिनी यमुना नदी में पानी की कमी की समस्या हमेशा के लिए दूर हो जाएगी। इस परियोजना में सबसे बड़ी अड़चन पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश की तरफ से आ रही है। हिमाचल पहले से ही एक ऊर्जा सरप्लस (अतिरिक्त बिजली वाला राज्य है और इस बांध के बनने से उसका एक बड़ा हिस्सा जलमग्न होना है, जिससे वहां के गांव प्रभावित होंगे। इसी वजह से हिमाचल इस पर उतनी गंभीरता नहीं दिखा रहा था। हालांकि, अब जब खुद गृह मंत्रालय ने इस पूरे मामले की कमान अपने हाथों में ले ली है, तो उम्मीद जताई जा रही है कि विस्थापन के शिकार होने वाले करीब 1000 परिवारों के उचित पुनर्वास और सभी छह राज्यों के बीच जल्द ही पूर्ण सहमति बन जाएगी।