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रिम्स प्रबंधन को एनसीएसटी की बड़ी नसीहत: डॉ. आशा बोलीं-रिम्स अपनी नियमावली खुद बनाए, सरकार पर निर्भरता छोड़े,फैसलों में लाएं तेजी

editor
  • Tapas Vishwas
  • July 07, 2026 03:07 PM
Major advice from NCST to RIMS management: Dr. Asha Lakra stated that RIMS should formulate its own regulations, stop relying on the government, and expedite decision-making.

रांची। झारखंड के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान 'राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान' (रिम्स) की प्रशासनिक और चिकित्सीय व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। मंगलवार को रिम्स की कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय समीक्षा करते हुए आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा ने प्रबंधन को दो टूक शब्दों में कहा कि रिम्स एक पूर्णतः स्वायत्त (ऑटोनॉमस) संस्था है, इसलिए उसे अपनी आंतरिक नियमावली स्वयं तैयार करनी चाहिए। जानकारी के अभाव में रिम्स अब तक हर छोटे-बड़े फैसले के लिए राज्य सरकार पर निर्भर रहा है, जिससे कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रियाएं और मरीजों का हित प्रभावित हुआ है।

डॉ. आशा लकड़ा ने समीक्षा बैठक में स्पष्ट किया कि रिम्स को ऑटोनॉमस बॉडी इसलिए बनाया गया था ताकि संस्थान के भीतर नीतिगत निर्णय तेजी से लिए जा सकें। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से मिलने वाली वित्तीय और अन्य सुविधाएं पूर्ववत जारी रहेंगी, लेकिन आंतरिक नियम और प्रक्रियाएं रिम्स को स्वयं तय करनी होंगी। आयोग ने रिम्स में डॉक्टरों, प्रोफेसरों, जूनियर डॉक्टरों और एमबीबीएस चिकित्सकों की नियुक्ति, पदोन्नति (प्रमोशन) तथा बैकलॉग भर्ती की कड़ाई से समीक्षा की। डॉ. लकड़ा ने निर्देश दिया कि सभी श्रेणियों के लिए अलग-अलग आरक्षण रोस्टर तैयार कर उसे तुरंत ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाए। बैठक के दौरान राज्य में अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित 26 प्रतिशत आरक्षण के अनुपालन की स्थिति पर गहन चर्चा हुई। डॉ. आशा लकड़ा ने एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को स्पष्ट करते हुए कहा यदि कोई अनुसूचित जनजाति का अभ्यर्थी अपनी योग्यता के बल पर सामान्य श्रेणी में चयनित होता है, तो उसे आरक्षित कोटे में न गिना जाए। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पद को उसी वर्ग के दूसरे योग्य अभ्यर्थी से ही भरा जाना चाहिए। प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने के लिए उन्होंने हर विभाग में तैनात 'लायजन ऑफिसर' (संपर्क अधिकारी) को विशेष और उचित प्रशिक्षण देने को कहा। साथ ही रिम्स के भीतर ही आरक्षित वर्गों और महिलाओं के मामलों की सुनवाई के लिए एक 'ग्रिवांस रिड्रेसल सेल' और 10 से 12 सदस्यों की एक स्थायी समिति गठित करने का सुझाव दिया। डॉ. लकड़ा ने कहा कि रिम्स की साख केवल झारखंड तक सीमित नहीं है; यहाँ छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र से भी हर दिन हजारों की संख्या में गरीब मरीज इलाज के लिए आते हैं। मरीजों की सहूलियत के लिए उन्होंने ओपीडी में हिंदी भाषा में डिजिटल डिस्प्ले लगाने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, किस दिन कौन सा विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध रहेगा, इसकी पूरी जानकारी एक सप्ताह पहले ही स्थानीय समाचार पत्रों में विज्ञापित करने को कहा ताकि दूर-दराज से आने वाले मरीजों को परेशान न होना पड़े। अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को सराहते हुए आयोग ने सुरक्षा गार्डों के प्रशिक्षण को और बेहतर करने की बात कही। वहीं, अस्पताल में मरीजों और परिजनों के साथ होने वाली तनातनी की घटनाओं को रोकने के लिए उन्होंने एक बड़ा निर्देश दिया। डॉ. लकड़ा ने कहा कि नवनियुक्त नर्सों के लिए मरीजों और उनके तीमारदारों के प्रति संवेदनशीलता और बेहतर व्यवहार संबंधी 'कैपेसिटी बिल्डिंग' (क्षमता विकास) कार्यक्रम अनिवार्य रूप से चलाया जाए। आयोग ने अंत में निर्देश दिया कि आंतरिक शिकायतों की समीक्षा के लिए हर तीन महीने में बैठक हो, और रिम्स निदेशक हर छह महीने में स्वयं रोस्टर तथा आरक्षण नियमों के पालन की समीक्षा करें। इस महत्वपूर्ण बैठक में आयोग के संयुक्त सचिव अमित निर्मल, कानूनी सलाहकार शुभाशीष सोरेन, राहुल यादव सहित रिम्स के निदेशक, अधीक्षक और चिकित्सा अधीक्षक मुख्य रूप से उपस्थित रहे।
 


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