बिहार में 'खास महाल' जमीन पर बड़ा ऐलान: 15 अगस्त के बाद बदलेगी पूरी व्यवस्था, फ्री-होल्ड करने की तैयारी में सरकार
पटना। राजधानी पटना समेत बिहार के कई प्रमुख शहरों में दशकों से 'खास महाल' की जमीन पर रह रहे लाखों लोगों के लिए एक बेहद बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। बिहार सरकार अब इस दशकों पुरानी पेचीदा जमीनी समस्या का स्थायी समाधान करने के लिए पूरी तरह एक्शन मोड में आ गई है। बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दिलीप जायसवाल ने एक बड़ा ऐतिहासिक ऐलान करते हुए कहा है कि सरकार 'खास महाल' की जमीन को लेकर एक व्यापक और जनहितैषी नीति बनाने जा रही है, जिसकी नई व्यवस्था आगामी 15 अगस्त के बाद धरातल पर दिखने लगेगी।
राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दिलीप जायसवाल ने स्पष्ट किया कि 15 अगस्त के बाद पहले चरण में सरकार खास महाल के जमीन होल्डरों (लीजधारकों) के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक करेगी। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य जमीन पर काबिज लोगों की राय जानना है। सरकार सीधे जनता से संवाद करेगी ताकि किसी के साथ अन्याय न हो। राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दिलीप जायसवाल ने रणनीति का खुलासा करते हुए कहा पटना समेत बिहार के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर खास महाल की जमीन है, जिसे लोगों ने सरकार से लीज पर ले रखा है। हम खुद भूखंड होल्डरों के साथ बैठेंगे और उनसे पूछेंगे कि वे किस रेट पर या किन शर्तों पर इस जमीन को 'फ्री-होल्ड' (पूर्ण मालिकाना हक) कराना चाहते हैं। आम जनता की राय मिलने के बाद ही सरकार किसी ठोस और खास नतीजे पर पहुंचेगी। बिहार में खास महाल जमीन का इतिहास मुख्य रूप से ब्रिटिश काल से जुड़ा हुआ है। अंग्रेजों के जमाने में इस सरकारी जमीन को आवासीय, व्यावसायिक या कृषि कार्यों के लिए निजी व्यक्तियों या संस्थाओं को एक निश्चित अवधि (जैसे 30, 66 या 99 वर्षों) के लिए लीज (पट्टे) पर दिया गया था। पूरे बिहार में खास महाल जमीन का कुल रकबा लगभग 4,193 एकड़ (करीब 4,200 एकड़) है, जो राज्य के 12 महत्वपूर्ण जिलों में फैला हुआ है। अकेले राजधानी पटना में लगभग 137 एकड़ खास महाल की जमीन है। पटना के बेहद वीआईपी और व्यस्त इलाकों जैसे कदमकुआं, मीठापुर, चिरैयाटांड़, छज्जूबाग आदि में लगभग 10,000 से अधिक परिवार इस जमीन पर बसे हुए हैं। कई साल बीत जाने और लीज की अवधि खत्म होने के कारण अब तक न तो स्थानीय लोगों का इस पर मालिकाना हक कायम हो पाया है और ना ही यह जमीन पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में आ सकी है। कई पीढ़ियों के विस्तार के बाद अब यह एक बड़ी सामाजिक और प्रशासनिक समस्या बन चुकी है। कानूनी रूप से खास महाल की जमीन पूरी तरह से सरकारी जमीन होती है, जिसका असली मालिकाना हक राज्य सरकार के पास सुरक्षित होता है। यह किसी जमींदार या निजी व्यक्ति की संपत्ति नहीं होती और इसका सीधा प्रबंधन जिला प्रशासन करता है। वर्तमान कानून के मुताबिक, लीज पर रहने वाले व्यक्ति को इस जमीन को बेचने, किसी दूसरे के नाम ट्रांसफर करने या उस पर नया निर्माण करने के लिए सरकार से लिखित अनुमति लेनी अनिवार्य होती है। अवधि पूरी होने पर लीज को रिन्यू (नवीनीकरण) करने या जमीन वापस लेने का पूरा अधिकार सरकार के पास सुरक्षित रहता है। इस खास महाल के दायरे में मुख्य रूप से लावारिस संपत्तियां, पूर्व में सरकार द्वारा जब्त की गई जमीनें, बंजर भूमि और वे सरकारी संपत्तियां आती हैं जो 1950 के जमींदारी उन्मूलन कानून के बाद सीधे सरकार के नियंत्रण में आ गई थीं। अब सरकार के इस नए रुख से लाखों लोगों को अपनी ही जमीन पर असली 'मालिक' बनने का कानूनी हक मिलने की उम्मीद बंध गई है।