उत्तराखंड में 'एसटी' प्रमाण पत्रों पर बड़ा घमासान: राज्य गठन के बाद जारी सभी सर्टिफिकेट की उच्चस्तरीय जांच की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों के जारी होने और उनके आधार पर लिए गए सरकारी लाभों को लेकर एक बार फिर बड़ा संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़ा हो गया है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने उत्तराखंड में राज्य गठन से लेकर अब तक जारी किए गए सभी एसटी प्रमाण पत्रों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाकर प्रशासनिक हलके में हड़कंप मचा दिया है।
एडवोकेट विकेश सिंह नेगी ने इस गंभीर मामले को लेकर सूबे के मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को एक पत्र भेजा है। पत्र में उन्होंने मांग की है कि यदि नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत प्रमाण पत्र जारी हुए हैं, तो उनके आधार पर प्राप्त नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों, मुआवजा, भूमि आवंटन और अन्य सरकारी आरक्षण के लाभों की तुरंत विधिक समीक्षा की जानी चाहिए। नेगी का कहना है कि यह केवल सर्टिफिकेट का मामला नहीं है, बल्कि वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने अपनी मांग के पक्ष में मजबूत कानूनी दलीलें पेश की हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 के तहत अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को है और इसमें संशोधन का हक सिर्फ संसद के पास है। राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण को इसमें बदलाव का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित 'स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000)' और हालिया 7 न्यायाधीशों की संविधान पीठ के 'स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024)' फैसले का हवाला दिया है। इन फैसलों में अदालत ने साफ किया है कि मूल सूची में नई जाति जोड़ने या नाम बदलने का अधिकार केवल संसद को ही है। इस विषय पर केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने भी पहले ही स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जनजातियों से जुड़ा यह विषय पूरी तरह संसद के माध्यम से ही तय हो सकता है। आरटीआई एक्टिविस्ट ने आरोप लगाया कि देहरादून जनपद के विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से एसटी प्रमाण पत्र जारी करने को लेकर विवाद चल रहा है। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से इतर नामों या उपजातियों के आधार पर भी सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं। यह समस्या सिर्फ देहरादून तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के सभी 13 जनपदों में इसकी गहन समीक्षा होनी चाहिए। मुख्य सचिव को भेजे पत्र में मांग की गई है कि जो प्रमाण पत्र मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाएं, उन्हें तत्काल निरस्त किया जाए। साथ ही, जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए सभी विभागों, विश्वविद्यालयों, आयोगों और पुलिस निकायों से ऐसे लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की गई है। बात न माने जाने पर मामले को न्यायालय और राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की चेतावनी दी गई है।