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झारखंड में परिसीमन पर महासंग्राम! आदिवासी सीटों के घटने की आशंका से सियासी उबाल,संगठनों ने आज बुलाई सर्वदलीय बैठक

editor
  • Tapas Vishwas
  • June 27, 2026 01:06 PM
Major standoff over delimitation in Jharkhand! Political turmoil erupts over fears of a reduction in tribal seats; organizations have called an all-party meeting today.

रांची। झारखंड की सियासत में इन दिनों 'परिसीमन' को लेकर एक बड़ा तूफान खड़ा हो गया है। लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय करने की सुगबुगाहट के साथ ही राज्य का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। परिसीमन के कारण राज्य में आदिवासियों की राजनीतिक हिस्सेदारी घटने की गंभीर आशंकाओं के बीच विभिन्न आदिवासी और सामाजिक संगठनों ने इसके खिलाफ पूरी तरह से गोलबंदी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में विरोध के सुरों को और तेज करने तथा आगे की रणनीति तय करने के लिए आज रविवार को रांची प्रेस क्लब में एक हाई-प्रोफाइल सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है।

सामाजिक कार्यकर्ता अनिल अमिताभ पन्ना ने बताया कि रविवार को होने वाली इस महाबैठक में विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष प्रतिनिधि, वर्तमान एवं पूर्व सांसद, विधायक, कानूनी विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी और आदिवासी समाज के प्रमुख चेहरे एक मंच पर आकर अपने विचार रखेंगे। विवाद की मुख्य वजह यह है कि झारखंड में वर्तमान विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर तय हैं। केंद्र सरकार द्वारा पारित परिसीमन अधिनियम के तहत देश भर में सीटों के पुनर्गठन को वर्ष 2026 तक के लिए फ्रीज (यथावत) रखा गया था। अब चूंकि यह समयसीमा पूरी हो रही है, इसलिए आशंका है कि जल्द ही नया परिसीमन शुरू होगा। वर्तमान में झारखंड विधानसभा की कुल 81 सीटों में से 28 सीटें अनुसूचित जनजाति और 9 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। आदिवासी संगठनों को डर है कि नए परिसीमन में एसटी आरक्षित सीटों की संख्या 28 से घटकर सीधे 21 या 22 के आसपास पहुंच सकती है। यही स्थिति लोकसभा सीटों को लेकर भी बनी हुई है। झारखंड में लोकसभा की कुल 14 सीटें हैं, जिनमें से 8 सामान्य, 5 अनुसूचित जनजाति और 1 सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। संगठनों का साफ मानना है कि जनसंख्या के नए आंकड़ों के आधार पर यदि सीमाओं का पुनर्निर्धारण हुआ, तो आदिवासियों की 1 लोकसभा सीट भी कम हो सकती है, जिससे संसद से लेकर विधानसभा तक उनकी आवाज कमजोर पड़ जाएगी। यह पहली बार नहीं है जब झारखंड में परिसीमन पर बवाल हो रहा है। इससे पहले वर्ष 2006 में भी राज्य में परिसीमन लागू करने का गंभीर प्रयास किया गया था। लेकिन उस वक्त भी आदिवासियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भारी कटौती की आशंका को देखते हुए पूरे राज्य में उग्र आंदोलन और भारी विरोध हुआ था। जनभावनाओं को देखते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति के विशेष आदेश से 2001 की जनगणना पर आधारित उस परिसीमन को झारखंड में रोक दिया गया था और 2026 तक पुरानी सीमाओं को ही संवैधानिक कवच दिया गया था।

सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा  के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडे ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए इसे 'आदिवासी विरोधी चाल' करार दिया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी सीटों को कम करने की किसी भी कोशिश का सड़क से सदन तक पुरजोर विरोध किया जाएगा। वहीं, कांग्रेस के प्रदेश मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने सवाल उठाया कि सीटें घटने पर दलितों और आदिवासियों की आवाज कौन उठाएगा? उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की कि इस संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी करने के बजाय देश स्तर पर सर्वदलीय बैठक बुलाकर सभी दलों की राय ली जाए। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी ने इस परिसीमन का स्वागत किया है और इसे एक अनिवार्य संवैधानिक प्रक्रिया बताया है। प्रदेश भाजपा प्रवक्ता संदीप वर्मा ने कहा कि झारखंड में आदिवासियों की आबादी में जो गिरावट आई है, वह एक कड़वी सच्चाई है। उन्होंने संथाल परगना सहित सीमावर्ती इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण बदल रही डेमोग्राफी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दलों को सिर्फ वोट बैंक की राजनीति नहीं करनी चाहिए, बल्कि आदिवासियों के वास्तविक अस्तित्व को बचाने पर ध्यान देना चाहिए। इस राजनीतिक घमासान के बीच पिछले दिनों आदिवासी छात्र संगठन के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा था। छात्रों और युवाओं का तर्क है कि आदिवासियों के ऐतिहासिक, सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर ही अनुसूचित जनजाति की वर्तमान आरक्षित सीटों की संरचना को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाए। बहरहाल, परिसीमन की प्रक्रिया विधिवत शुरू होने से पहले ही झारखंड की धरती पर शुरू हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक रूप ले सकता है।


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