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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: जनहित याचिका के नाम पर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वाले शिव शंकर शर्मा की रिव्यू याचिका खारिज

editor
  • Tapas Vishwas
  • July 06, 2026 09:07 AM
Major verdict by Jharkhand High Court: Review petition dismissed for Shiv Shankar Sharma, who misused the judicial process in the name of Public Interest Litigation (PIL).

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता शिव शंकर शर्मा को बहुत बड़ा झटका दिया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने शिव शंकर शर्मा की ओर से दायर सिविल रिव्यू (समीक्षा) याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अपने आवेदन में ऐसा कोई नया तथ्य या कानूनी त्रुटि पेश करने में नाकाम रहे, जिसके आधार पर पूर्व में (9 मई 2025 को) सुनाए गए फैसले की दोबारा समीक्षा की जा सके। इसके साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ता पर लगाया गया 50 हजार रुपये का जुर्माना भी सख्ती से बरकरार रखा है।

दरअसल, शिव शंकर शर्मा ने पूर्व में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसे हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया था। मूल फैसले के पैरा 32 और 36 में अदालत ने याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता (क्रेडेंशियल्स) पर गंभीर सवाल उठाए थे। इसी फैसले और लगाए गए 50 हजार रुपये के जुर्माने को हटाने की मांग को लेकर शिव शंकर शर्मा ने पुनर्विचार (रिव्यू) याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि जब जनहित याचिका के शुरुआती चरण में ही पात्रता की जांच हो चुकी थी, तो कई साल सुनवाई चलने के बाद अंतिम फैसले में दोबारा साख पर सवाल उठाना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि याचिका समाज के भले के लिए थी और इसमें कोई निजी हित नहीं था। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मूल याचिका में याचिकाकर्ता ने अपनी साख और विश्वसनीयता साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि केवल यह कह देना कि "मेरा कोई निजी हित नहीं है", किसी भी व्यक्ति को स्वतः जनहित याचिका दायर करने का वैध अधिकार नहीं दे देता। अपने आदेश को सुदृढ़ करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा वर्ष 2022 में शिव शंकर शर्मा के ही एक अन्य मामले में दी गई व्यवस्था का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था कि उक्त याचिकाकर्ता की 'लोकस स्टैंडी' (याचिका दायर करने का अधिकार) संदिग्ध है और उन्होंने साफ नीयत से अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि शीर्ष अदालत की वह टिप्पणी इस मामले में भी पूरी तरह प्रासंगिक है, जिससे साफ है कि याचिकाकर्ता पहले भी न्यायिक मंचों का दुरुपयोग कर चुके हैं। अदालत ने इस बात पर भी कड़ी नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ता ने पूर्व में तय समय सीमा के भीतर जुर्माने की 50 हजार रुपये की राशि जमा नहीं की। वह केवल रिव्यू याचिका लंबित रहने का फायदा उठाकर भुगतान को टालते रहे, जिसे कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया के प्रति निष्पक्ष आचरण के विपरीत माना। हाईकोर्ट ने अंत में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश देते हुए कहा कि जनहित याचिका एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था है। इसका उपयोग किसी भी हाल में निजी स्वार्थ साधने, अधिकारियों पर अनुचित दबाव बनाने या उन्हें ब्लैकमेल करने के हथकंडे के रूप में नहीं किया जा सकता। ऐसे तत्वों पर सख्ती बरतना बेहद जरूरी है ताकि वास्तविक जनहित याचिकाओं की पवित्रता और विश्वसनीयता बची रहे।


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