1 जुलाई से इतिहास बनेगी मनरेगा: मनरेगा मैन' के राज्य में शुरू होगा 'विकसित भारत गारंटी मिशन
पटना। बिहार के ग्रामीण परिवेश और रोजगार की दशा-दिशा बदलने वाली ऐतिहासिक 'मनरेगा' (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) आगामी 1 जुलाई से राज्य में पूरी तरह बंद होने जा रही है। इसकी जगह अब केंद्र सरकार की नई महत्वाकांक्षी योजना 'विकसित भारत गारंटी मिशन ग्रामीण' लागू होगी। 'मनरेगा मैन' के नाम से मशहूर पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रघुवंश प्रसाद सिंह की कर्मभूमि बिहार से इस योजना का विशेष जुड़ाव रहा है, इसलिए इस बड़े बदलाव को लेकर राज्य के सियासी और सामाजिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इस नई योजना के सुचारू संचालन के लिए केंद्र सरकार ने बिहार के लिए 6,715 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया है, जबकि राज्य सरकार ने अपने कोटे से 1,890 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। हाल ही में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार के बीच इस संबंध में एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक भी हो चुकी है।
नई 'वीबी ग्रामग योजना ग्रामीण मजदूरों के लिए कुछ बड़े बदलाव लेकर आ रही है। रोजगार गारंटी की सीमा को 100 दिनों से बढ़ाकर अब 125 दिन कर दिया गया है। दावा है कि काम पूरा होने के 3 से 15 दिनों के भीतर मजदूरी सीधे बैंक खाते में भेज दी जाएगी। यदि कोई मजदूर काम मांगता है और उसे 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं मिला, तो सरकार उसे बेरोजगारी भत्ता देगी। नई योजना के तहत जल संरक्षण, चेक डैम निर्माण, पौधारोपण, बाढ़-सुखाड़ नियंत्रण, पशुपालन, आंगनबाड़ी और स्कूल परिसरों के विकास जैसे कृषि-आधारित कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस बदलाव का दूसरा पहलू वित्तीय और प्रशासनिक है। ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, अब तक मजदूरी का अधिकांश खर्च केंद्र उठाता था, लेकिन नई व्यवस्था में राज्य सरकार को भी 40% का योगदान देना होगा। सामग्री मद में भी राज्य का हिस्सा बढ़ा है, जिससे बिहार सरकार पर लगभग 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। इसके अलावा, ए.एन. सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान के प्रोफेसर विद्यार्थी विकास ने नई योजना के व्यावहारिक पहलुओं पर चिंता जताई है। उनका कहना है, "यह कानून ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता को प्रभावित कर केंद्रीकरण को बढ़ावा देगा। सबसे बड़ा पेच यह है कि 'रबी और खरीफ के व्यस्त मौसम' के दौरान मजदूरों को इस योजना के तहत काम नहीं मिलेगा, जिससे ग्रामीण मजदूरों की मोल-भाव (सौदेबाजी) करने की क्षमता कमजोर हो जाएगी।1 जुलाई से इस नई योजना की शुरुआत हो रही है। केंद्र के पास मनरेगा का 3,000 करोड़ बकाया था, जिसमें से 1,000 करोड़ मिल गए हैं और हमने रिलीज कर दिए हैं। नई योजना के लिए भी बजट मिल गया है। हम बिहार के लोगों को 125 दिनों के रोजगार की गारंटी सुनिश्चित करेंगे। केंद्र सरकार ने सिर्फ नाम बदला है और राज्यों के ऊपर भारी वित्तीय बोझ डाल दिया है। जब मनरेगा में ही समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा था, तब 40% खर्च राज्यों पर थोपने से मजदूरों की मुश्किलें और बढ़ेंगी। केंद्र इस योजना को ठंडे बस्ते में डालना चाहता है। बिहार में रोजगार की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024-25 में राज्य में रिकॉर्ड 25 करोड़ मानव दिवस सृजित हुए थे। अब देखना यह है कि राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ के बीच क्या मजदूरों को समय पर मजदूरी मिल पाएगी या नहीं।