मियांवाला तालाब अतिक्रमण मामला: हाईकोर्ट सख्त, डीएम देहरादून को 3 महीने के भीतर जांच और फैसले का आदेश
नैनीताल। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के मियांवाला क्षेत्र में तालाब और जलमग्न भूमि पर हो रहे अतिक्रमण को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जिलाधिकारी देहरादून को मामले की विस्तृत जांच करने और तीन महीने के भीतर इस पर अंतिम निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। देहरादून के मियांवाला निवासी महेंद्र सिंह बटोला ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर क्षेत्र के पर्यावरण और सरकारी रिकॉर्ड से जुड़ी गंभीर अनियमितताएं उजागर की थीं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सरकारी अभिलेखों में जो भूमि 'तालाब' और 'जलमग्न' (Waterlogged) के रूप में दर्ज है, उस पर भू-माफियाओं और विभागीय मिलीभगत से अतिक्रमण किया गया है। याचिका में सबसे चौंकाने वाला खुलासा मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण को लेकर किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि एमडीडीए ने नियम-विरुद्ध जाकर इस जलमग्न भूमि का स्वरूप बदल दिया है। आरोप है कि विभाग ने तालाब की जमीन पर पार्क का निर्माण कर दिया और अपने निजी हितों के लिए वहां रास्ता भी बना लिया है। याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी जलस्रोत या तालाब की भूमि का स्वरूप बदला नहीं जा सकता। महेंद्र सिंह बटोला के अनुसार, उन्होंने इस अतिक्रमण और स्वरूप परिवर्तन के खिलाफ स्थानीय प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को कई बार शिकायत पत्र दिए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासन की इसी निष्क्रियता के चलते उन्हें हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। माननीय न्यायालय ने मामले की गंभीरता को समझते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया है, लेकिन जिलाधिकारी देहरादून को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन का बारीकी से परीक्षण करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि डीएम 90 दिनों के भीतर जांच पूरी कर यह सुनिश्चित करें कि क्या वास्तव में सरकारी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ हुई है और यदि अतिक्रमण पाया जाता है, तो उसे तत्काल हटाया जाए।