नैनीताल:खतरे की आहट! बार-बार दरक रही चार्टन लॉज की पहाड़ी, स्थायी समाधान की तलाश में जुटे विशेषज्ञ,वैज्ञानिक सर्वे,स्थायी स्लोप स्टेबलाइजेशन का कार्य शुरू
नैनीताल।
मल्लीताल स्थित चार्टन लॉज क्षेत्र में एक बार फिर भूस्खलन का खतरा गहरा गया है। पिछले वर्ष भारी बारिश के दौरान हुए भूस्खलन से एक दर्जन से अधिक परिवारों के मकान खतरे की जद में आ गए थे। उस समय जिला प्रशासन ने प्रभावित ढलान पर जियो बैग लगाकर अस्थायी सुरक्षा उपाय किए थे, लेकिन हाल में हुई मूसलाधार बारिश के बाद क्षेत्र में फिर से जमीन खिसकने के संकेत मिलने लगे हैं। इससे स्थानीय लोगों की चिंता एक बार फिर बढ़ गई है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन शुरू कराया है। इसके लिए पोलावरम परियोजना प्राधिकरण, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्व प्रमुख (जियो) एवं एनएचपीसी लिमिटेड के विशेषज्ञों की टीम क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण कर रही है।

निरीक्षण के दौरान जियोटेक सलाहकार एवं पूर्व सदस्य विशेषज्ञ भास्कर दत्त पाटनी ने कहा कि नैनीताल की पहाड़ियां प्राकृतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं और उनकी भार वहन क्षमता लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि अनियोजित बहुमंजिला निर्माण, पहाड़ियों पर बढ़ता दबाव और जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होना भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ा रहा है। उनके अनुसार चार्टन लॉज क्षेत्र में स्थायी और वैज्ञानिक उपचार समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, ताकि भविष्य में जान-माल के नुकसान को रोका जा सके।
चार्टन लॉज क्षेत्र पिछले कई वर्षों से भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता रहा है। सितंबर 2023 में यहां हुए बड़े भूस्खलन में एक दो मंजिला भवन पूरी तरह ध्वस्त हो गया था, जबकि उसके नीचे स्थित अन्य मकान भी क्षतिग्रस्त हुए थे। खतरे को देखते हुए प्रशासन ने 22 मकानों में रहने वाले 24 परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित किया था। भू-वैज्ञानिकों की जांच में यह भी सामने आया था कि वर्षा जल और सीवेज की उचित निकासी नहीं होने के कारण पहाड़ी के भीतर पानी का दबाव बढ़ा और भूस्खलन की स्थिति बनी।
चार्टन लॉज के उपचार के लिए राज्य सरकार ने इस वर्ष करोड़ों रुपये की परियोजना को मंजूरी दी है और अब क्षेत्र में स्थायी स्लोप स्टेबलाइजेशन का कार्य शुरू किया जा रहा है। यदि वैज्ञानिक तरीके से पहाड़ी का उपचार नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मानसून के दौरान यह इलाका फिर बड़े खतरे का सामना कर सकता है।
नैनीताल का इतिहास भी बताता है कि यह शहर भूस्खलन के प्रति बेहद संवेदनशील रहा है। वर्ष 1880 में शेर-का-डांडा क्षेत्र में हुए विनाशकारी भूस्खलन में 150 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। इस त्रासदी के बाद शहर में जल निकासी व्यवस्था और पहाड़ी सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया था। चार्टन लॉज जैसी घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि हिमालयी शहरों में विकास के साथ भू-वैज्ञानिक मानकों का पालन करना बेहद जरूरी है।