नैनीताल:भारतीय ज्ञान परंपरा और महिला सशक्तिकरण पर कुमाऊं विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी,महिलाओं के हक में लड़ने वाले जिला शासकीय अधिवक्ता सुशील कुमार शर्मा हुए सम्मानित
नैनीताल। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के माता जिया रानी महिला अध्ययन केंद्र की ओर से "भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की भूमिका" विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन एम.एम.टी.टी.वी. स्थित देवदार हॉल (हार्मिटेज) में किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं के बहुआयामी योगदान को रेखांकित करते हुए समावेशी विरासत और समकालीन महिला सशक्तिकरण के विभिन्न आयामों पर गंभीर अकादमिक विमर्श को बढ़ावा देना था।
संगोष्ठी की मुख्य अतिथि नैनीताल विधायक सरिता आर्या तथा विशिष्ट अतिथि दर्जा राज्य मंत्री शांति मेहरा रहीं। अपने संबोधन में विधायक सरिता आर्या ने भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका, उनके नेतृत्व, ज्ञान और सामाजिक योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं की आवाज को अकादमिक और नीतिगत विमर्श में अधिक प्रभावी स्थान मिलना चाहिए।
मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग की प्रोफेसर मधुलिका बनर्जी ने भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की बौद्धिक विरासत, ज्ञान सृजन में उनकी भूमिका तथा समकालीन भारत में समावेशी विकास और महिला सशक्तिकरण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत व्याख्यान दिया।
कार्यक्रम में माता जिया रानी महिला अध्ययन केंद्र की निदेशक प्रो. नीता बोरा शर्मा ने संगोष्ठी की विषयवस्तु और इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। वहीं पूर्व अधिष्ठाता प्रो. ऋषिपाल, समाजसेवी एवं उद्यमी उपासना बोरा तथा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ज्योतिषाचार्य नंदिता पांडे ने भी अपने विचार व्यक्त किए। नंदिता पांडे ने भारतीय ज्योतिष की ज्ञान परंपरा पर विशेष व्याख्यान दिया, जबकि अन्य वक्ताओं ने महिलाओं की भूमिका, समावेशी समाज के निर्माण और वर्तमान चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही शांति मेहरा ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और भारतीय प्राचीन ज्ञान परंपरा के व्यापक प्रसार से ही भारत पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। वहीं उपासना बोरा ने कहा कि आज महिलाएं केवल आत्मनिर्भर ही नहीं बन रही हैं, बल्कि रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
इस अवसर पर जनपद नैनीताल के जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) एवं विशेष लोक अभियोजक सुशील कुमार शर्मा को उनके विधिक एवं सामाजिक योगदान और महिलाओं के हक में आवाज़ उठाने के लिए समारोह में सम्मानित किया गया। सम्मान के दौरान उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों ने उनके कार्यों की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं।
आपको बता दें कि उत्तराखंड के नैनीताल जिला न्यायालय में पिछले 16 वर्षों से जिला शासकीय अधिवक्ता अपराध के पद पर कार्यरत सुशील शर्मा का नाम आज न्याय और संघर्ष का पर्याय बन गया है। रामगढ़ की पहाड़ियों में जन्मे श्री शर्मा ने अपनी शुरुआती शिक्षा हरटोला के सरकारी स्कूल से प्राप्त की। आगे की पढ़ाई के लिए वे तल्ला रामगढ़ इंटर कॉलेज तक रोजाना 15 किलोमीटर पैदल जाया करते थे। इसी दृढ़ता के साथ उन्होंने नैनीताल डिग्री कॉलेज से स्नातक और 1989 में अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज से एलएलबी की डिग्री हासिल की।

वकालत की शुरुआत उन्होंने 1989 में निजी बचाव पक्ष के वकील के रूप में की। अगले 11 वर्षों तक उन्होंने राजस्व, दीवानी और आपराधिक कानून में गहरी पकड़ बनाई। वर्ष 2000 में उन्होंने अपना पूरा ध्यान नैनीताल के सत्र न्यायालय पर केंद्रित किया और यहां अपनी पैरवी से एक मजबूत पहचान बनाई। उनकी कानूनी कुशाग्रता और सत्यनिष्ठा को देखते हुए 2010 में उन्हें नैनीताल जिले का जिला शासकीय अधिवक्ता अपराध नियुक्त किया गया। तब से वे राज्य के मुख्य अभियोजक के रूप में जिले में न्याय की कमान संभाल रहे हैं।
सुशील शर्मा की सबसे बड़ी पहचान महिलाओं और बच्चों से जुड़े संवेदनशील अपराधों में रही है। इन मामलों में उन्होंने अभियोजन पक्ष का नेतृत्व कर अपराधियों के खिलाफ दोषसिद्धि की उल्लेखनीय रूप से उच्च दर हासिल की है।

उनके कुशल मार्गदर्शन में राज्य ने क्षेत्र के 5 से 6 जघन्य अपराध मामलों में अदालत से मृत्युदंड की सजा भी सुनिश्चित करवाई है। इसके अलावा दहेज हत्या, गौहत्या, चोरी और पॉकेटमारी जैसे विविध आपराधिक मामलों में भी उन्होंने सफल पैरवी की है। राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े जटिल और हाई-प्रोफाइल मुकदमों को संभालने के लिए उन्हें ऊधम सिंह नगर के पुलिस अधीक्षक द्वारा आधिकारिक 'विशेष उल्लेख' और प्रशंसा भी प्राप्त हुई है।
पिछले 37 वर्षों के अपने करियर में सुशील शर्मा ने यह साबित किया है कि दृढ़ संकल्प और मेहनत से पहाड़ का एक साधारण छात्र भी न्याय व्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ बन सकता है। आज वे न सिर्फ राज्य सरकार के प्रतिनिधि हैं, बल्कि कमजोर और पीड़ितों के लिए न्याय की आखिरी उम्मीद भी हैं।