पहलगाम हमला: बरसी पर 'मिनी स्विट्जरलैंड' में सन्नाटा, यादों में आज भी जिंदा है 'वो' खौफनाक मंजर
श्रीनगर। कश्मीर की वादियों में जब चिनार के पत्ते गिरते हैं, तो वे एक नई ऋतु का संकेत देते हैं, लेकिन पहलगाम की हवाओं में आज एक अलग ही भारीपन है। आज उस दिल दहला देने वाली घटना को एक साल पूरा हो गया है, जिसने 'धरती के स्वर्ग' को खून से लाल कर दिया था। बैसरन के हरे-भरे घास के मैदान, जिन्हें दुनिया 'मिनी स्विट्जरलैंड' के नाम से जानती थी, आज भी खामोश हैं। सुरक्षा बढ़ा दी गई है, लेकिन जख्म अब भी हरे हैं।
आज से ठीक एक साल पहले, आतंकवादियों ने बैसरन के मैदान में निहत्थे पर्यटकों पर गोलियां बरसाई थीं। इस कायराना हमले में 25 पर्यटकों ने अपनी जान गंवाई थी। लेकिन इस त्रासदी के बीच वीरता की एक मिसाल भी पैदा हुई—आदिल हुसैन शाह। स्थानीय घोड़ा चालक (पोनी-वाला) आदिल ने अपनी जान की परवाह न करते हुए पर्यटकों को बचाने की कोशिश की और अंततः आतंकियों की गोली का शिकार होकर शहीद हो गया। आज पूरा जम्मू-कश्मीर आदिल की शहादत और उन मासूम जिंदगियों को याद कर रहा है। बरसी के अवसर पर जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, "हम भूलेंगे नहीं, हम माफ नहीं करेंगे।" उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत के अटूट संकल्प को दोहराते हुए कहा कि प्रशासन घाटी से आतंकवाद को जड़ से मिटाने के लिए प्रतिबद्ध है। वहीं, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी मारे गए पर्यटकों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि एक साल बीत जाने के बाद भी हम हिंसा के खिलाफ एकजुट हैं। मुख्यमंत्री ने विश्वास दिलाया कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी कि ऐसी घटना दोबारा कभी न हो। बीते एक साल में सुरक्षा एजेंसियों ने रणनीतिक रूप से बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। 'ऑपरेशन महादेव' के तहत उन तीन आतंकियों को मार गिराया गया जो इस हमले के मास्टरमाइंड थे। पिछले एक साल में घाटी में कुल 46 आतंकवादी ढेर किए जा चुके हैं। टट्टू एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद वहीद के लिए आज का दिन किसी डरावने सपने जैसा है। वहीद उस दिन सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचने वाले लोगों में से थे। उन्होंने रुआंसे गले से बताया, "जब मैं वहां पहुंचा, तो समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ है। हर तरफ चीख-पुकार मची थी। हमने कलमा पढ़ा, यह सोचकर कि शायद हम भी जिंदा न बचें। वहीद ने एक दिल दहला देने वाली घटना साझा की एक महिला पर्यटक अपने पति के शव को छोड़कर नीचे उतरने को तैयार नहीं थी। उसने कहा था, "हम साथ आए थे, अकेले कैसे जाऊं?" वहीद कहते हैं कि आज अगर बैसरन खुल भी जाए, तो उनका दिल वहां जाने को नहीं करता। होटल व्यवसायी जावेद अहमद के लिए वह दिन खुशियों का था, उनके नए होटल का उद्घाटन होना था। लेकिन गोलियों की गूंज ने सब तबाह कर दिया। जावेद कहते हैं, "आर्थिक नुकसान तो भर गया, लेकिन वो मानसिक आघात कभी नहीं भरेगा। मैंने तब से पहलगाम जाना ही छोड़ दिया है। प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से घाटी के लगभग 50 पर्यटन स्थलों को अस्थाई रूप से बंद किया था। धीरे-धीरे सभी स्थान खोल दिए गए, लेकिन बैसरन आज भी पर्यटकों के लिए प्रतिबंधित है। पहलगाम शहर से 7 किलोमीटर दूर पहाड़ों की तलहटी में स्थित इस पिकनिक स्पॉट तक जाने वाले कच्चे रास्ते पर आज भी सुरक्षाकर्मियों का कड़ा पहरा है। पहलगाम की वादियों में आज सन्नाटा तो है, लेकिन यह सन्नाटा एक संकल्प भी है। यह संकल्प है आतंकवाद के अंत का, और उस विश्वास की बहाली का, जो कश्मीर की मेहमाननवाजी की पहचान है। पर्यटकों के परिवारों के साथ एकजुटता दिखाते हुए पूरा प्रशासन और स्थानीय जनता आज भी उन मासूमों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रही है।