डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं! देश में 1.1 करोड़ ग्रेजुएट बेरोजगार, केरल-ओडिशा में सबसे खराब हालात, दिल्ली सबसे बेहतर
नई दिल्ली। देश में उच्च शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ा है, लेकिन रोजगार के अवसर उसी रफ्तार से नहीं बढ़ पाए हैं। इसका असर अब बेरोजगारी के आंकड़ों में साफ दिखाई दे रहा है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026' रिपोर्ट और पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार, भारत में इस समय करीब 1.1 करोड़ ग्रेजुएट युवा बेरोजगार हैं। यानी लाखों ऐसे युवा हैं, जिन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली है, लेकिन उन्हें अब भी रोजगार नहीं मिल पाया है।
रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल बेरोजगारी दर में मामूली सुधार जरूर हुआ है। वर्ष 2024 में यह 3.20 प्रतिशत थी, जो 2025 में घटकर 3.10 प्रतिशत हो गई। वहीं युवा बेरोजगारी दर भी 10.3 प्रतिशत से घटकर 9.9 प्रतिशत पर आ गई है। इसके बावजूद ग्रेजुएट युवाओं की बेरोजगारी चिंता का विषय बनी हुई है। वर्तमान में ग्रेजुएट बेरोजगारी दर 22.7 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई को दर्शाती है। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 1983 में 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग में केवल 50 लाख ग्रेजुएट थे। अब यह संख्या बढ़कर 6.3 करोड़ से अधिक हो चुकी है। यानी पिछले 43 वर्षों में ग्रेजुएट युवाओं की संख्या लगभग 13 गुना बढ़ी है। लेकिन इसी अवधि में ग्रेजुएट बेरोजगारों की संख्या 7 लाख से बढ़कर 1.1 करोड़ पहुंच गई है, जो करीब 16 गुना वृद्धि को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च शिक्षा का विस्तार तो हुआ, लेकिन रोजगार सृजन की गति उससे काफी पीछे रह गई। अगर राज्यों की बात करें तो केरल में ग्रेजुएट बेरोजगारी दर सबसे अधिक 19.8 प्रतिशत है। इसके बाद ओडिशा (18.9 प्रतिशत), बिहार (16.6 प्रतिशत) और तमिलनाडु (16.3 प्रतिशत) का स्थान है। दूसरी ओर दिल्ली में यह दर केवल 5.7 प्रतिशत और गुजरात में 6 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति को दर्शाती है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि देश के कुल बेरोजगारों में करीब 83 प्रतिशत हिस्सेदारी 15 से 29 वर्ष के युवाओं की है। यानी बेरोजगारी का सबसे अधिक असर युवा वर्ग पर पड़ रहा है। वहीं 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के कुल बेरोजगारों में लगभग 67 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। आसान शब्दों में कहें तो आज हर तीन बेरोजगार युवाओं में दो ग्रेजुएट हैं। हालांकि रोजगार के स्वरूप में कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिले हैं। नियमित वेतन वाली नौकरियों का हिस्सा 2024 के 22.4 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 23.6 प्रतिशत हो गया है। वहीं स्वरोजगार करने वालों की हिस्सेदारी 57.5 प्रतिशत से घटकर 56.2 प्रतिशत रह गई है। कृषि क्षेत्र में रोजगार का हिस्सा भी घटा है, जबकि विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और सेवा (सर्विस) क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। इससे संकेत मिलता है कि युवा धीरे-धीरे अधिक संगठित और नियमित वेतन वाली नौकरियों की ओर बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उच्च शिक्षा का विस्तार पर्याप्त नहीं है। यदि उद्योग, सेवा क्षेत्र और नई अर्थव्यवस्था के अनुरूप रोजगार के अवसर तेजी से नहीं बढ़ाए गए, तो शिक्षित बेरोजगारी आने वाले वर्षों में और बड़ी चुनौती बन सकती है। मौजूदा आंकड़े इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि अब देश के सामने सबसे बड़ी जरूरत डिग्री नहीं, बल्कि डिग्री के अनुरूप रोजगार उपलब्ध कराने की है।