राष्ट्रपति: 25 जुलाई को ही क्यों होता है राष्ट्रपति का शपथग्रहण समारोह,किसकी शपथ लेते है राष्ट्रपति? कौन दिलवाता है राष्ट्रपति को शपथ? राष्ट्रपति भवन का क्या है इतिहास जानिए रोचक जानकारी खबर के लिंक में
आज देश को 15वे राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू या यशवंत सिन्हा मिलने वाले है। कुछ ही समय बाद वोटों की गिनती खत्म हो जाएगी और हमारे सामने देश का नया राष्ट्रपति होगा।एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की जीत लगभग तय मानी जा रही है। द्रौपदी मुर्मू के गांव में उनकी जीत होने से पहले ही जश्न मनाया जा रहा है ,उनके पैतृक स्थान ओडिशा के रायरंगपुर में तो जश्न की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। नतीजे आने के बाद मिठाइयां बांटी जाएंगी। रायरंगपुर में 20 हजार लड्डू तैयार किये गए हैं।
आइये जानते है कि राष्ट्रपति 25 जुलाई को ही शपथग्रहण क्यो करता है और राष्ट्रपति भवन कितना खास है।
भारत के 15वे राष्ट्रपति 25 जुलाई को शपथग्रहण करेंगे इसके लिए सभी तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी है। मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति को शपथ दिलवाएंगे। किसी वजह स अगर मुख्य न्यायाधीश शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत नही कर पाते तो सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश राष्ट्रपति को शपथ दिलवाते है।
देश में 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र लागू हुआ। उसी दिन डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने। तब तक देश में लोकसभा चुनाव नहीं हुए थे। 1951-52 में पहली बार लोकसभा और राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। इसके बाद राष्ट्रपति चुनाव हुए। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद 13 मई 1952 को जीतकर फिर से इस पद पर पहुंचे। 1957 में लगातार दूसरी बार जीतकर डॉक्टर प्रसाद राष्ट्रपति बने। डॉक्टर प्रसाद 12 साल तक इस पद पर रहे। 13 मई 1962 को उनका कार्यकाल पूरा हुआ और डॉक्टर राधाकृष्णन देश के दूसरे राष्ट्रपति बने। उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया।
पांच साल बाद 13 मई 1967 को डॉक्टर जाकिर हुसैन देश के तीसरे राष्ट्रपति बने। डॉक्टर हुसैन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। 3 मई 1969 को उनका निधन हो गया। हुसैन के निधन के बाद उप-राष्ट्रपति वीवी गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। इसके बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
वीवी गिरि के इस्तीफे के बाद उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतउल्ला कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त हुए। चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद 24 अगस्त 1969 को वीवी गिरि नए राष्ट्रपति बने। गिरि ने अपना कार्यकाल पूरा किया।
गिरि के बाद 24 अगस्त 1974 को फखरुद्दीन अली अहमद नए राष्ट्रपति बने। अहमद कार्यकाल पूरा नहीं कर पाने वाले दूसरे राष्ट्रपति बने। 11 फरवरी 1977 को उनका निधन हो गया। अहमद के निधन के बाद उप-राष्ट्रपति बीडी जत्ती कार्यवाहक राष्ट्रपति बने।
इसके बाद चुनाव हुए। चुनाव के बाद 25 जुलाई 1977 को नीलम संजीव रेड्डी देश के नए राष्ट्रपति बने। तब से लेकर अब तक हर राष्ट्रपति ने अपना कार्यकाल पूरा किया है। इसी वजह से 25 जुलाई को नए राष्ट्रपति शपथ लेते हैं। तब से अब तक नौ राष्ट्रपति 25 जुलाई को शपथ ले चुके हैं।
राष्ट्रपति भवन का इतिहास
राष्ट्रपति भवन इटली के रोम स्थित क्यूरनल पैलेस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निवास स्थान है। इस भवन में लगभग 340 कमरे हैं। राष्ट्रपति भवन के बैंक्वेट हॉल में एक साथ 104 लोग बैठ सकते हैं। राष्ट्रपति भवन में 750 कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें से 245 राष्ट्रपति के सचिवालय में कार्यरत हैं।
1911 में अंग्रेजों ने कोलकाता की जगह दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला किया। तब वो दिल्ली में एक ऐसी इमारत बनाना चाहते थे, जो आने वाले कई सालों तक टिकी रहे और लोगो के लिए एक मिसाल बने। अंग्रेजों ने इसके लिए रायसीना की पहाड़ियों को चुना। यहां उन्होंने वायसराय के लिए एक शानदार इमारत बनाने का फैसला किया।
इमारत का नक्शा तब के मशहूर आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस ने तैयार किया। लुटियंस ने हर्बट बेकर को 14 जून, 1912 को इस आलीशान इमारत का नक्शा बनाकर भेजा। जगह मिल गई। नक्शा तैयार हो गया और अब अंग्रेजों ने काम शुरू कर दिया। सबसे पहले 1911 से 1916 के बीच ब्रिटिश हुकुमत ने रायसीना और मालचा गांवों के 300 लोगों की करीब चार हजार हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया।
1929 में ये आलीशान इमारत बनकर तैयार हुई,उस वक्त इसके निर्माण में 1 करोड़ 40 लाख रुपये खर्च हुए थे। राष्ट्रपति भवन में प्राचीन भारतीय शैली, मुगल शैली और पश्चिमी शैली की झलक देखने को मिलती है।15 अगस्त, 1947 को भारत की आजादी के साथ ही वायसराय हाउस भी नए युग में पहुंच गया। आजादी के बाद दो साल तक ये इमारत गर्वमेंट हाउस के नाम से जानी जाती रही। 26 जनवरी, 1950 को भारत गणतंत्र बना और देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बनाए गए। 1950 में गर्वमेंट हाउस को राष्ट्रपति भवन बदल दिया गया। राजेंद्र प्रसाद यहां रहने आए, लेकिन वह भी राष्ट्रपति भवन की शानो-शौकत को अपना नहीं पाए। उन्होंने भी राजगोपालाचारी की परंपरा को जारी रखते हुए गेस्टरूम में रहने का फैसला लिया। गेस्टरूम में रहने की परंपरा आज भी कायम है। राष्ट्रपति भवन में 750 कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें से 245 राष्ट्रपति के सचिवालय में कार्यरत हैं।