रामपुर तिराहा कांड : धरने पर बैठी महिलाओं से हुआ था बलात्कार, इतिहास का सबसे घिनौना और शर्मनाक सच जानिए,आज तक नही हुआ न्याय
रामपुर तिराहा कांड को आज 27 साल पूरे हो गए हैं। पिछले 27 साल से हम सब उम्मीद कर रहे हैं कि उत्तराखंड के अपराधियों, रामपुर तिहारा कांड के आरोपियों को शायद अब सज़ा मिलेगी, लेकिन अब यह उम्मीद भी टूटने लगी है। हक़ीक़त यह है कि इस मामले में उत्तराखंड की सरकारों ने गंभीरतापूर्वक पैरवी ही नहीं की और इस बात का ग़म आज राज्य सरकार में शामिल राज्य आंदोलनकारियों को भी है।
मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर एक अक्तूबर 1994 को पुलिस बर्बरता का नया इतिहास रचा गया था। सबसे शर्मनाक बात यह रही कि रात के अंधेरे में जान बचाने के लिए भागी महिलाओं की अस्मत लूटी गई। जी हां! 02 अक्टूबर, 1994 का वो काला दिन आज भी उत्तराखंडियों के घाव हरे कर देता है,जब अलग राज्य के दर्जे की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे बेकसूर लोगों पर यूपी पुलिस ने मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर लाठीचार्ज ही नहीं किया,बल्कि फायरिंग भी की और धरने पर बैठी महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़ किया गया। ऐसा घिनौना और शर्मनाक दिन शायद ही उत्तराखंड के इतिहास में कभी दर्ज हुआ होगा।
सीबीआई जांच में महिलाओं की अस्मत लूटने की पुष्टि भी हुई थी। रेप के मामले में सीबीआई बनाम मिलाप सिंह और सीबीआई बनाम राधा मोहन द्विवेदी मामले में 15 पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोप तय किए जा चुके हैं। इस विभत्स घटना के बाद ये आंदोलन देश के सबसे बर्बर आंदोलन में शुमार हो गया। उत्तराखंड की कांग्रेस और भाजपा सरकार ने दोषियों को सजा दिलाने के दावे तो बहुत किए, लेकिन किया कुछ भी नहीं। हर साल रामपुर तिराहा कांड की बरसी मनाई जाती है और उधर आरोपी पुलिस कर्मियों की मौत के साथ दो मुकदमों की फाइल कब की बंद हो चुकी है, जबकि अन्य पांच मुकदमों की पैरोकारी में बरती जा रही हीलाहवाली पीड़ितों को तड़पा रही हैं।
आज दो, अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो’ नारे के साथ हुए संघर्ष से उत्तराखंड तो मिला गया लेकिन सपनों का उत्तराखंड रामपुर तिराह कांड की फ़ाइलों के साथ दफ़न हो गया है, सही मायने में उत्तराखंडी तब तक सम्मान के साथ नहीं जी सकेंगे जब तक रामपुर तिहारा कांड के आरोपियों को सज़ा नहीं मिलती।