• Home
  • News
  • Rampur Tiraha incident: 30 years on, hope for justice remains unfulfilled; High Court reserves verdict

रामपुर तिराहा कांड: 30 साल बाद भी अधूरी न्याय की आस, हाईकोर्ट ने रखा फैसला सुरक्षित 

editor
  • Tapas Vishwas
  • March 10, 2026 01:03 PM
Rampur Tiraha incident: 30 years on, hope for justice remains unfulfilled; High Court reserves verdict

नैनीताल। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे चर्चित और दर्दनाक घटनाओं में शामिल रामपुर तिराहा कांड एक बार फिर न्यायालय की दहलीज पर गूंजा। उत्तराखंड हाईकोर्ट में इस मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से यह महत्वपूर्ण सवाल किया कि इस मामले में दर्ज छह मुकदमे इस समय किस अदालत में चल रहे हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश पक्ष ने अदालत को बताया कि मुख्य आरोपी रहे तत्कालीन मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह से संबंधित मुकदमे की स्थिति और वह किस अदालत में लंबित है, इस बारे में उनके पास कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि इन मुकदमों पर वर्षों से कोई प्रभावी सुनवाई नहीं हो पाई है। घटना को करीब 30 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन मुकदमों की स्थिति आज भी अस्पष्ट बनी हुई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, जिला जज ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के एक पत्र के आधार पर इन छह मामलों को सुनवाई के लिए मुजफ्फरनगर की अदालत में भेज दिया था। इसके बाद से इन मामलों में कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है।

राज्य आंदोलनकारी और अधिवक्ता रमन शाह ने अदालत को बताया कि इस कांड के दौरान सात महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म हुआ था और 17 अन्य आंदोलनकारियों को गंभीर रूप से प्रताड़ित किया गया था। वहीं इस हिंसक घटना में सात आंदोलनकारियों की मौत भी हो गई थी। गौरतलब है कि 2 अक्टूबर 1994 को पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी दिल्ली कूच कर रहे थे। इसी दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में पुलिस और प्रशासन की ओर से आंदोलनकारियों पर कथित रूप से अत्याचार किए गए। आरोप है कि पुलिस कार्रवाई के दौरान महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हुईं और कई आंदोलनकारियों की मौत हो गई। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी थी। जांच के दौरान तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह समेत कई लोगों के खिलाफ हत्या, फायरिंग और गंभीर चोट पहुंचाने जैसी धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। हालांकि राज्यपाल की ओर से अभियोजन की अनुमति न मिलने के कारण अनंत कुमार सिंह को कानूनी राहत मिल गई थी। बाद में राज्य आंदोलनकारियों की सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील के बाद यह मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट, नैनीताल में स्थानांतरित कर दिया गया था। अब सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस ऐतिहासिक मामले में अदालत का आगामी निर्णय आंदोलनकारियों और पीड़ित परिवारों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।


संबंधित आलेख: