उत्तराखंड में 'सुरक्षा कवच' तैयार: ग्लेशियर झीलों पर लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, 500 सेंसरों से मापी जाएगी भूकंप की आहट
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने अब 'विज्ञान और तकनीक' को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। सचिवालय में आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने राज्य में चल रही भूकंप चेतावनी प्रणाली, ग्लेशियर झील प्रबंधन और भूस्खलन न्यूनीकरण परियोजनाओं की गहन समीक्षा की। सरकार का लक्ष्य तकनीक के माध्यम से आपदा आने से पहले ही जान-माल को सुरक्षित करना है।
देहरादून स्थित सचिवालय में मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने राज्य में आपदा जोखिम न्यूनीकरण से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा की। बैठक में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली, राष्ट्रीय भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम, ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम प्रबंधन और भूस्खलन नियंत्रण जैसे अहम विषयों पर प्रगति और भविष्य की रणनीति पर चर्चा की गई। ग्लेशियर झील विस्फोट के खतरे को कम करने के लिए वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा किए जा रहे कार्यों की समीक्षा की गई। सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने बताया कि वसुंधरा झील को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और रियल-टाइम मॉनिटरिंग व्यवस्था स्थापित की जाएगी। भविष्य में इस मॉडल को अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर भी लागू करने की योजना है। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि वाडिया संस्थान वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए विस्तृत कार्ययोजना और टाइमलाइन प्रस्तुत करे। इसमें अर्ली वार्निंग सिस्टम, डिसीजन सपोर्ट सिस्टम, झील के जलस्तर को नियंत्रित करने और संरचनात्मक उपायों को स्पष्ट रूप से शामिल करने को कहा गया। भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली को लेकर भी राज्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। जानकारी दी गई कि वर्तमान में 169 सेंसर और 112 सायरन स्थापित किए जा चुके हैं। IIT रुड़की के सहयोग से इस प्रणाली को और मजबूत किया जा रहा है। 26 फरवरी 2026 को हुए एमओयू के तहत पूरे वर्ष 2026 में अलर्ट प्रसारण, संचालन और रखरखाव का कार्य किया जा रहा है। राष्ट्रीय भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत 500 स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर लगाए जा रहे हैं, जबकि चेतावनी प्रणाली को और प्रभावी बनाने के लिए 526 अतिरिक्त सेंसर लगाने का प्रस्ताव है। राज्य में भूकम्पीय निगरानी को मजबूत करने के लिए रुड़की, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रामनगर, बागेश्वर, अल्मोड़ा, केदारनाथ और चकराता में नई सिस्मोलॉजिकल वेधशालाएं स्थापित करने की योजना भी बनाई गई है। भूस्खलन और मलबा बहाव के खतरे को लेकर भी गंभीरता से काम किया जा रहा है। चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में 48 संवेदनशील स्थलों की पहचान की गई है। इन क्षेत्रों को जोखिम के आधार पर उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणियों में बांटकर प्राथमिकता तय की जा रही है। इस कार्य के लिए कई वैज्ञानिक संस्थानों की संयुक्त समिति बनाई गई है, जिसमें भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान और अन्य तकनीकी संस्थान शामिल हैं। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि इन संवेदनशील क्षेत्रों में जल्द सर्वेक्षण, निगरानी और निवारक कार्य शुरू किए जाएं तथा जिला प्रशासन और तकनीकी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए। उत्तराखंड सरकार आपदा प्रबंधन को लेकर हाई-टेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है।