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स्वतंत्रता का प्रतीक सेंगोल!जब ब्रिटिश शासन का सूर्य भारत मे अस्त हो गया था तब सत्ता हस्तांतरण के लिए गौरवशाली सेंगोल को चुना गया!किसने बनाया था राजदंड सेंगोल को?भारतीय होने के नाते नए संसद भवन में स्थापित सेंगोल का स्वर्णिम इतिहास जानिए

editor
  • Awaaz Desk
  • May 28, 2023 03:05 PM
Sengol, the symbol of freedom! When the sun of British rule set in India, the glorious Selong was chosen for the transfer of power!

दिल्ली: पीएम नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन का उद्घाटन किया जिसमें तमिलनाडु से आए अधीनम संतों ने धार्मिक अनुष्ठान के बाद पीएम मोदी को सेंगोल सौंपा। इस विशेष सेंगोल को पीएम मोदी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के साथ नई संसद के लोकसभा भवन में स्थापित कर दिया। बीते कुछ दिनों से सेंगोल पूरे भारत मे सुर्खियां बटोर रहा है। इससे पहले शायद ही आपने सेंगोल के बारे में कभी सुना होगा। आखिर क्या है सेंगोल? इसका निर्माण किसने किया था? इसके ऊपर विराजमान नंदी का संदेश क्या है? 

आइये जानते है ये अति महत्वपूर्ण जानकारी

दिल्ली में तमिलनाडु के सदियों पुराने मठ के आधीनम महंतों का आगमन उस परंपरा को फिर से सत्ता का खास अंग बनाने के लिए हुआ है, जिसका लेखा-जोखा हमारी प्राचीन पद्धतियों में दर्ज रहा है और जो इस देश की विरासत रही है।यहां उस सेंगोल की बात हो रही है, जिसे प्राचीन काल से राजदंड के तौर पर जाना जाता रहा है। यह राजदंड सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि राजा के सामने हमेशा न्यायशील बने रहने और प्रजा के लिए राज्य के प्रति समर्पित रहने के वचन का स्थिर प्रतीक भी रहा है।
निष्पक्ष न्यायपूर्ण शासन का प्रतीक सेंगोल जो इतिहास के बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा रहा गया आज वर्तमान का सबसे ज्यादा चर्चित किस्सा बन गया है,जो कि भारत में एक और गौरवशाली इतिहास बनाएगा।

 

सेंगोल भारत की उस स्वतंत्रता का प्रतीक है जिसके लिए भारत के न जाने कितने ही वीर हंसते हंसते फांसी पर झूल गए,न जाने कितने देश प्रेमियों ने अपना सबकुछ भारत की स्वतंत्रता पर न्योच्छावर कर दिया।

सेंगोल का संबंध जिस राजवंश से है, उसके विषय में उत्तर भारत में पूरी जानकारी बहुत कम लोगों को है।  सेंगोल, चोलवंश से संबंध रखता है उस चोलवंश से, जिसके जिक्र के बिना दक्षिण भारत का इतिहास लिखना असंभव है. चोल राजवंश ऐसा राजवंश है, जिसने 1600 वर्षों से अधिक तक शासन किया. आज जिसे हम बंगाल की खाड़ी कहते हैं, उसे कभी 'चोलों की झील' तक कहा जाने लगा था. इस राजवंश ने बंगाल से लेकर दक्षिण भारत और सुदूर दक्षिण के दूसरे देशों तक राज किया था. इस वंश में राजेंद्र चोल प्रथम और राजाराज चोल जैसे प्रतापी राजा हुए। चोलवंश का वैभवशाली इतिहास है। इसका अहसास तो आपको पीएस-1, और पीएस-2 जैसी फिल्में देखकर भी हुआ ही होगा।
इसी चोलवंश में 2600 साल पहले चोल राजाओं ने सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक बनाया।इसी के माध्यम से ना जाने कितने राजाओं ने अपने उत्तराधिकारियों को सत्ता सौंपी चोलवंश के बाद मौर्य और गुप्त राजवंश में भी इसी तरह सत्ता सौंपने के कई किस्से हैं। आगे भी हम बताएंगे कि किस तरह सेंगोल   चोलों के मठ पर संपर्क किया गया और राजदंड सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण के समय नेहरू को सौंपा गया।

 पर इससे पहले ये जानिए कि जुलाई 1947 में जब भारत अपनी आजादी के बिलकुल करीब था. ब्रिटिश शासन का सूर्य भारत में अस्त होने वाला था. जिस आज़ादी को पाने के लिए कई वीर जवानों ने कुर्बानी दी थी, वो आजादी मिलने की घड़ी निकट आ रही थी. अंतिम वॉयसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन के कंधे पर जिम्मेदारी थी कि वो भारतीयों को स्वतंत्रता सौंपे, मगर कैसे?

एक दिन लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने दफ्तर में जवाहरलाल नेहरू से सत्ता के हस्तांतरण के संबंध में सवाल किया। उन्होंने पूछा कि आप किस तरह सत्ता का हस्तांतरण चाहते हैं. उन्होंने कहा कि ये ऐतिहासिक अवसर है, इसलिए हाथ मिलाना या फाइल का आदान प्रदान ठीक नहीं है.तब सेंगोल का ज़िक्र किया गया जो ऐतिहासिक राजदंड के तौर पर देखा जाता था। अगस्त 1947 में सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दिया गया राजदंड (सेंगोल) इलाहाबाद संग्रहालय की नेहरू दीर्घा में रखा गया था और इसे संसद के नये भवन में स्थापित करने के लिए दिल्ली लाया गया है। राजदंड को इलाहाबाद संग्रहालय की नेहरू गैलरी के हिस्से के रूप में जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी कई अन्य ऐतिहासिक वस्तुओं के साथ रखा गया था। 


ऐसा कहा जाता है कि  लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने दफ्तर में जब जवाहरलाल नेहरू से सत्ता के हस्तांतरण के संबंध में सवाल किया और सेंगोल का ज़िक्र आया तब भारत के गवर्नर जनरल रहे सी राजगोपालाचारी और जवाहरलाल नेहरू ने तमिलनाडु के प्रमुख मठ तिरुवदुथुराई अधीनम से संपर्क किया। इस मठ को 500 साल पहले स्थापित किया गया था। चोला भूमि के केंद्र में स्थापित ये मठ आज भी कार्यरत है। चोल राजा शिव भक्त थे,वहां सत्ता हस्तांतरण के समय भगवान शिव का आह्वान कर महंत सेंगोल को न्याय के प्रतीक के रुप में दूसरे राजा को सौंपता था। चोलों द्वारा हजारों साल पहले स्थापित उनके मंदिरों में आज भी पूजा की जाती है. उस वक्त सी राजगोपालाचारी की गुजारिश पर तत्कालीन मठ प्रमुख और 20वें गुरु श्री ला श्री अंबालावना डेसिका स्वामीगल ने यह बीड़ा उठा लिया. वो उस वक्त बीमार चल रहे थे,लेकिन हिन्दुस्तान की आजादी में सेंगोल की भूमिका के मद्देनजर उन्होंने हामी भर दी और सेंगोल बनाने का काम उस वक्त के मद्रास के एक प्रसिद्ध ज्वैलर को सौंपा। और इस स्वर्णकार का नाम था वुम्मीदी बंगारु चेट्टी!

 


 
वुम्मीदी बंगारू चेट्टी ने साल 1900 में मंदिरों के बाहर जेवर बेचने का काम शुरू किया था. सेंगोल को बनाने का काम उनके दो बेटों ने संभाला।उन्हें निर्देश दिया गया कि सेंगोल को चाँदी से निर्मित किया जाए, जिस पर सोने की परत होगी और सेंगोल के शीर्ष पर नंदी विराजमान होंगे, जो शक्ति और न्याय का प्रतीक हैं. अधीनम मठों में बड़े बड़े नंदी आज भी विराजमान हैं।

1947 में मूल राजदंड के निर्माण में शामिल दो व्यक्तियों- 96 वर्षीय वुम्मिदी एथिराजुलु और 88 वर्षीय वुम्मिदी सुधाकर के नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में शामिल होने की उम्मीद है


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