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हरिद्वार पहुंचे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद,ऋषिकेश से शुरू होने वाली 'गाडू घड़ा' कलश यात्रा में होंगे शामिल

editor
  • Tapas Vishwas
  • April 07, 2026 01:04 PM
Shankaracharya Avimukteshwaranand arrives in Haridwar; he will participate in the 'Gadu Ghada' Kalash Yatra, which is set to commence from Rishikesh.

हरिद्वार। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मंगलवार को धर्मनगरी हरिद्वार पहुंचे। महाकुंभ विवाद के बाद पहली बार उत्तराखंड आगमन पर उन्होंने कनखल स्थित शंकराचार्य मठ में पत्रकारों से वार्ता की। इस दौरान उन्होंने उत्तराखंड सरकार द्वारा चारधाम यात्रा में 'गैर-हिंदुओं' के प्रवेश पर रोक लगाने और पहचान पत्रों की जांच के नियमों का पुरजोर समर्थन किया। शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि चारधाम केवल पर्यटन स्थल नहीं बल्कि सर्वोच्च आस्था के केंद्र हैं, जहाँ केवल उन्हीं को आना चाहिए जिनकी इस धर्म में अटूट श्रद्धा हो।

शंकराचार्य ने कहा कि चारधाम की पवित्रता बनाए रखना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। उन्होंने तर्क दिया, "यदि विरुद्ध प्रकृति के लोग चारधाम आते हैं, तो वहां का आध्यात्मिक वातावरण बिगड़ जाता है। जो लोग केवल कौतूहलवश या घूमने के लिहाज से आते हैं, उनसे मर्यादा प्रभावित होती है। सरकार ने जो नियम बनाए हैं, वे स्वागत योग्य हैं।" उन्होंने कहा कि परंपरा के अनुसार, जिन लोगों के लिए ये धाम आस्था के केंद्र हैं, उन्हें ही वहां आने की अनुमति होनी चाहिए। शंकराचार्य ने बताया कि भगवान बदरीनाथ के कपाट खुलने से पूर्व 'गाडू घड़ा' (तेल कलश) की प्राचीन परंपरा का विशेष महत्व है। डिम्मर पंचायत के निमंत्रण पर वे स्वयं बुधवार को ऋषिकेश से रवाना होने वाली कलश यात्रा में शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि इसी कलश के तेल से बदरीनाथ धाम के गर्भगृह में छह महीने तक अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है। जनभावनाओं का सम्मान करते हुए वे इस बार इस पावन परंपरा का हिस्सा बन रहे हैं। कुंभ मेले के निमंत्रण से जुड़े सवाल पर शंकराचार्य के स्वर थोड़े तल्ख नजर आए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में सरकार और अखाड़े मिलकर कुंभ का आयोजन कर रहे हैं और वे शंकराचार्यों से परामर्श नहीं ले रहे हैं। उन्होंने कहा, "जब वे सब कुछ खुद ही कर रहे हैं, तो हमें कुछ नहीं कहना।" वहीं, मिडिल ईस्ट (ईरान-इजराइल) में चल रहे युद्ध पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध लड़ने वालों को भले न रोका जा सके, लेकिन जो देश इसमें शामिल नहीं हैं, उन पर इसका आर्थिक या सामाजिक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने विश्व के विद्वानों से न्याय और अन्याय के पक्ष को स्पष्ट करने की अपील की।


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