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तो क्या विरोध और बगावत के बीच अंतर को नही समझ पाई दिल्ली पुलिस, जामिया हिंसा मामले में आरोपियों को बरी करते हुए क्यों लगी दिल्ली पुलिस को फटकार? 

editor
  • Awaaz Desk
  • February 06, 2023 01:02 PM
So did the Delhi Police not understand the difference between protest and rebellion, why was the Delhi Police reprimanded while acquitting the accused in the Jamia violence case?

नई दिल्‍ली: 2019 जामिया हिंसा मामले में दिल्‍ली पुलिस की किरकिरी हुई है। कोर्ट ने शरजील इमाम, सफूरा जरगर, आसिफ इकबाल तन्हा और आठ अन्य को बरी कर दिया। साकेत कोर्ट ने 32 पेज के ऑर्डर में पुलिसिया जांच की धज्जियां उड़ा दीं। अदालत ने तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट के लिए भी दिल्‍ली पुलिस को फटकारा। ऐडिशनल सेशंस जज अरुल वर्मा ने कहा क‍ि तीसरी चार्जशीट की शुरुआत ही गलतबयानी से होती है। दिल्‍ली पुलिस का केस अदालत में ताश के पत्‍तों की तरह ढह गया। फैसले में कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने गवाहों से आरोपी की फोटो के जरिए पहचान कराने में तीन साल लगा दिए। दो को छोड़कर बाकी सभी पुलिस के गवाह हैं जिससे केस 'संदिग्ध' हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि गवाह केवल यही बताते हैं कि आरोपी प्रदर्शन का हिस्सा थे और उनमें से कुछ 'तेज आवाज में बोल' रहे थे। कुछ 'पुलिस के साथ बहस' कर रहे थे। अदालत ने फैसले में कहा कि पुलिस ने ऐसा कुछ रिकॉर्ड पर नहीं रखा जिससे पहली नजर में ही सही, ऐसा लगे कि आरोपी दंगाई भीड़ का हिस्सा थे, उनमें से कोई हथियार नहीं लहरा रहा था, न ही पत्थर फेंक रहा था।' पढ़‍िए, कोर्ट में दिल्‍ली पुलिस कैसे फेल साबित हुई।

जामिया हिंसा केस: 'बलि का बकरा बनाया', फैसले में कोर्ट ने क्‍या-क्‍या कहा?
पुलिस असली अपराधियों को पकड़ने में असफल रही लेकिन उसने आरोपितों को बलि का बकरा जरूर बनाया।
आसिफ इकबाल तन्हा, शरजील इमाम, महमूद अनवर, मोहम्मद कासिम के खिलाफ देर से दाखिल की गई चार्जशीट से पहले तक कोई चश्‍मदीद नहीं था जो मौके पर उनकी मौजूदगी की पुष्टि करे। तीसरी चार्जशीट में गवाहों ने उन्हें पहचाना है... इसपर विचार नहीं किया जा सका।
काफी समय तक शिनाख्त परेड नहीं कराई गई और पुलिस ने इस बारे में सब कुछ साफ नहीं बताया। वे तीसरी चार्जशीट के बाद ही आरोपियों की पहचान कर सके। क्या पुलिस अपने केस को लेकर इतनी अनिश्चित थी?

चार्जशीट में कहीं भी यह बात नहीं है कि आरोपियों ने मिलकर कुछ किया या फिर मौके पर पहुंचकर वे एकजुट हो गए।
रिकॉर्ड पर कोई 'टूलकिट' नहीं रखी गई है जो अभियोजन के दावे को आधार दे सके कि आरोपियों ने सामूहिक रूप से काम किया।
अभियोजन पक्ष ने किसी तरह वॉट्सऐप चैट्स या SMSs पेश नहीं किए। न ही इस बात का सबूत दिया कि आरोपी आपस में बात कर रहे थे जिससे इस दावे को बल मिलता कि आरोपियों ने मिलकर कोई साजिश रची थी।

तस्‍वीरों में सभी 12 आरोपी एक-दूसरे के साथ नहीं खड़े हैं। वीडियो में भी वे एक-दूसरे को इशारा करते या बात करते नहीं दिखते। ऐसे में सामूहिक साजिश का आरोप नहीं बनता।
रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे प्रथमदृष्‍टया ऐसा लगे कि आरोपी किसी दंगाई भीड़ में शामिल थे। कोई भी किसी तरह का हथियार नहीं लहरा रहा था या पत्‍थर फेंक रहा था।

आरोपियों के खिलाफ इस बात का भी सबूत नहीं है कि उन्‍होंने कानून के पालन में रुकावट डाली। संभावनाओं के आधार पर चार्जशीट नहीं दाखिल की जा सकती।
जांच एजेंसी ने कोई नया सबूत नहीं रखा है, बल्कि एक और सप्‍लीमेंट्री चार्जशीट फाइल करने की आड़ में वही पुराने तथ्‍य सामने रख दिए हैं।

कोर्ट ने उस चार्ज को भी खारिज कर दिया कि आरोपियों ने 13 दिसंबर 2019 को जामिया इलाके में लगी CrPC की धारा 144 का उल्‍लंघन किया। अदालत ने कहा कि जहां प्रदर्शन हुए, वहां के लिए ऐसा कोई आदेश प्रभावी नहीं था। अदालत ने कहा कि किसी गवाह ने आरोपियों को कुछ करते नहीं देखा। केवल घटनास्‍थल पर मौजूदगी से आरोप तय नहीं होते।

जामिया केस: कोर्ट ने किन-किन को आरोपमुक्‍त किया?
शरजील इमाम
सफूरा जरगर
आसिफ इकबाल तन्‍हा
मोहम्‍मद अबूजार
उमैर अहमद
मोहम्‍मद शोएब
महमूद अनवर
मोहम्‍मद कासिम
बिलाल नदीम
शाहजार रजा खान
चंदा यादव


 

पूर्व गृह मंत्री पी चिंदंबरम ने किये ट्वीट 
 
पूर्व गृह मंत्री ने ट्वीट कर पूछा, "आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया सबूत भी हैं?" उन्होंने कहा, "अदालत का निष्कर्ष स्पष्ट नहीं है. कुछ आरोपी करीब तीन साल से जेल में बंद हैं. कुछ को कई महीनों बाद जमानत मिली है. यह प्री-ट्रायल कैद है." 
 
फाइल फोटो
पी चिदंबरम ने लगातार ट्वीट करते हुए कहा, "अयोग्य पुलिस और अति उत्साही अभियोजक मुकदमे से पहले नागरिकों को जेल में रखने के लिए जिम्मेदार हैं. उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी?" उन्होंने पूछा, "आरोपी के जेल में बिताए महीनों या वर्षों को कौन वापस करेगा?" 
फाइल फोटो
चिदंबरम ने कहा, "हमारी क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम, प्री ट्रायल कारावास को सहन करता है, ये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का अपमान है. सुप्रीम कोर्ट को कानून के इस दैनिक दुरुपयोग को खत्म करना चाहिए, जितनी जल्दी हो उतना अच्छा है." 
फाइल फोटो

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