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23 साल पुराना ‘जेनी प्रकरण’ फिर जीवंत: हरक सिंह रावत की प्रेसवार्ता पर टकटकी लगाए बैठी है सियासत

editor
  • Tapas Vishwas
  • November 07, 2026 09:11 AM
The 23-year-old ‘Jenny episode’ comes alive again: Political circles await Harak Singh Rawat’s press conference with bated breath.

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति के गलियारों में एक बार फिर से दो दशक से अधिक पुराना वह पन्ना पलट गया है, जिसने राज्य की सियासत और शासन व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। बात हो रही है बहुचर्चित ‘जेनी प्रकरण’ की, जिसने वर्ष 2003 में तत्कालीन एनडी तिवारी सरकार में भूचाल ला दिया था और तत्कालीन मंत्री हरक सिंह रावत को अपना पद गंवाना पड़ा था। अब इतने लंबे अंतराल के बाद पीड़ित महिला के एक बार फिर सामने आने, गंभीर और संगीन आरोप लगाने तथा मामले की नए सिरे से जांच की मांग ने सूबे की राजनीतिक हवा का रुख अचानक मोड़ दिया है। महिला के आक्रामक तेवर और भावुक बयानों के बाद अब सभी की निगाहें पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत की उस प्रेसवार्ता पर टिकी हैं, जिसमें वह अपना पक्ष रखने वाले हैं।

उत्तराखंड की राजनीति में करीब 23 साल पुराने चर्चित जेनी प्रकरण ने एक बार फिर हलचल मचा दी है। लंबे समय बाद देहरादून पहुंची जेनी नाम की महिला की ओर से पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद अब हरक सिंह रावत भी मीडिया के सामने अपनी बात रखने जा रहे हैं। महिला के खुलासों और दोबारा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जांच तथा डीएनए परीक्षण की मांग के बीच हरक सिंह रावत की प्रस्तावित प्रेसवार्ता को लेकर राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पूर्व मंत्री इन आरोपों पर क्या जवाब देते हैं और इस पुराने विवाद से जुड़े कौन से तथ्य सामने रखते हैं। दरअसल, जेनी प्रकरण वर्ष 2003 में उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था, जब उत्तराखंड में स्वर्गीय एनडी तिवारी की सरकार थी। उस दौरान हरक सिंह रावत को इस विवाद के चलते मंत्री पद गंवाना पड़ा था। उस समय जेनी नाम की महिला ने एक बच्चे को जन्म दिया था और हरक सिंह रावत पर बच्चे का पिता होने का आरोप लगाया था। इस मामले में डीएनए परीक्षण भी कराया गया था। हालांकि, अब इतने वर्षों बाद महिला की ओर से पुराने परीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने के बाद मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। हाल ही में देहरादून में आयोजित प्रेसवार्ता में महिला ने अपने साथ वर्ष 2002-03 के दौरान हुए कथित घटनाक्रम का जिक्र करते हुए कई गंभीर आरोप लगाए। उसने बताया कि वह अक्तूबर 2002 में करीब 16 वर्ष की उम्र में असम से देहरादून आई थी और लगभग दो महीने यमुना कॉलोनी में रही थी। महिला का आरोप है कि उस समय हरक सिंह रावत ने उसके साथ दुष्कर्म किया। उसने यह भी दावा किया कि तत्कालीन राजनीतिक प्रभाव के कारण उसे कहीं से मदद नहीं मिली। महिला ने आरोप लगाया कि गर्भवती होने के दौरान उसे मानसिक चिकित्सालय में रखा गया और उसके साथ हुई घटनाओं के बावजूद किसी ने उसकी सहायता नहीं की। उसके मुताबिक, उसे धमकाकर वहां से बाहर निकाला गया और कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी करवाए गए। उसने दावा किया कि सीबीआई की टीम उससे मिलने केवल एक बार पहुंची थी। इस पूरे विवाद में महिला ने सबसे बड़ा सवाल डीएनए परीक्षण को लेकर उठाया है। उसका कहना है कि जब उसके बेटे का नमूना ही नहीं लिया गया तो फिर डीएनए परीक्षण किस आधार पर किया गया? उसने पुराने परीक्षण की प्रक्रिया की दोबारा जांच कराने और नए सिरे से डीएनए परीक्षण कराने की मांग की है। महिला का कहना है कि उसका बेटा अब अपने पिता का नाम चाहता है और वह उसे न्याय दिलाने के लिए सामने आई है। महिला ने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री की ओर से उसका नाम लिए जाने के बाद उसने दोबारा देहरादून आने का फैसला किया। प्रेसवार्ता के दौरान वह कई बार भावुक हुई और अपने साथ हुए कथित घटनाक्रम को सार्वजनिक रूप से सामने रखने की बात कही। महिला के आरोपों के बाद हरक सिंह रावत की प्रेसवार्ता इस प्रकरण का नया राजनीतिक घटनाक्रम बन गई है। 23 साल पुराने इस विवाद में जहां महिला दोबारा जांच की मांग कर रही है, वहीं अब पूर्व मंत्री का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके बयान से इस विवाद पर नया राजनीतिक और कानूनी विमर्श शुरू होने की संभावना है। फिलहाल महिला की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में जांच अभिलेखों, पुराने डीएनए परीक्षण की प्रक्रिया और संबंधित पक्षों के बयानों के आधार पर ही तथ्यों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। अब सवाल सिर्फ पुराने विवाद के दोबारा सुर्खियों में आने का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या 23 साल बाद इस प्रकरण से जुड़े सभी सवालों का जवाब मिल पाएगा?


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