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उत्तराखंड में पंचायतों की बदलेगी सूरत: जल्द होंगे डीपीसी चुनाव,जिला योजना समिति योजना से रुकेगी कार्यों की डुप्लीकेसी

editor
  • Tapas Vishwas
  • April 28, 2026 07:04 AM
The Face of Panchayats in Uttarakhand Set to Change: DPC Elections to be Held Soon; District Planning Committee Mechanism to Prevent Duplication of Works.

उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत और निकाय चुनावों के संपन्न होने के बाद अब विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी 'जिला योजना समिति' के गठन की तैयारी तेज हो गई है। पंचायती राज विभाग ने अपना होमवर्क पूरा कर शासन को फाइल भेज दी है। अब केवल शासन की हरी झंडी और अधिसूचना का इंतजार है, जिसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग चुनावी प्रक्रिया शुरू कर देगा।

पंचायती राज निदेशक,आईएएस निधि यादव के अनुसार, जिला योजना समिति का अस्तित्व में आना क्षेत्र के विकास के लिए अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि शहरी निकायों और ग्राम पंचायतों से चुनकर आए सदस्य ही डीपीएस का गठन करते हैं। जिलों में जिलाधिकारियों द्वारा परिसीमन की कार्यवाही पूरी होते ही चुनाव कराए जाएंगे। डीपीएस के सक्रिय होते ही जिलों की वार्षिक विकास योजनाओं को बजट आवंटन और क्रियान्वयन में गति मिलेगी। राज्य में अब पंचायतों के कामकाज के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने मनरेगा का नाम बदलकर अब इसे जी आरएएम जी योजना के रूप में पेश किया है। नई व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायतों को 'एनुअल प्लान' के तहत दिए गए प्रस्तावों के आधार पर ही काम करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव विकास कार्यों की डुप्लीकेसी को रोकना है। अब पंचायती राज और मनरेगा की योजनाओं को मर्ज (मिश्रण) कर दिया गया है। पहले एक ही कार्य को दोनों मदों में दिखाकर बजट का दुरुपयोग होता था, जिसे अब डिजिटल निगरानी से रोका जाएगा। पंचायतों को अगले वित्तीय वर्ष का प्लान 2 अक्टूबर से 31 जनवरी के बीच चलने वाले 'पीपल प्लान कैंपेन' के दौरान देना अनिवार्य होगा। उत्तराखंड में ई-गवर्नेंस को मजबूत करते हुए ग्राम पंचायतों को 'डिजिटल इंडेक्स' से जोड़ दिया गया है। अब कोई भी ग्राम प्रधान सरकार की वेबसाइट पर जाकर अपना स्कोर देख सकता है। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिलेगी कि उनकी पंचायत कहाँ मजबूत है और कहाँ सुधार की जरूरत है। विभाग की वेबसाइट पर ट्रेनिंग मॉड्यूल भी उपलब्ध हैं, जहाँ प्रधान फंड मैनेजमेंट, प्रस्ताव तैयार करना और प्लानिंग की बारीकियां सीख सकते हैं।16वें वित्त आयोग ने पंचायतों के लिए सख्त गाइडलाइन जारी की है। अब ग्राम पंचायतें केवल सरकार के भरोसे नहीं रह सकतीं। यदि कोई पंचायत खुद का राजस्व जनरेट नहीं करती है, तो उसके कुल फंड में 20 प्रतिशत की कटौती कर दी जाएगी। निदेशक ने दक्षिण भारत की पंचायतों का उदाहरण देते हुए बताया कि वहाँ कई पंचायतों ने एक हजार करोड़ रुपये तक का अपना राजस्व जुटाया है। उत्तराखंड की पंचायतों को भी अब इसी दिशा में आत्मनिर्भर बनना होगा।


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