उपनल कर्मियों पर सरकार का 'यू-टर्न मॉडल'! दूसरी बार कट-ऑफ डेट बदलने की तैयारी, हाई कोर्ट में अवमानना याचिका के बाद बैकफुट पर शासन
देहरादून। उत्तराखंड में उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण और समान मानदेय का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। धामी कैबिनेट द्वारा उपनल कर्मियों को 'समान काम के बदले समान वेतन' देने के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब शासन स्तर पर भारी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। मंत्रिमंडल के निर्णय और बाकायदा शासनादेश जारी होने के बाद भी सरकार अब तक इसमें एक बार संशोधन कर चुकी है, और अब दूसरी बार फिर से 'कट-ऑफ डेट' को बदलने की बड़ी तैयारी चल रही है। शासन के इस 'यू-टर्न मॉडल' से जहां प्रशासनिक हल्कों में हलचल है, वहीं उपनल कर्मचारियों में भारी नाराजगी और अविश्वास का माहौल है।
यह पूरा विवाद नया नहीं है। उपनल कर्मचारी पिछले कई वर्षों से नियमितीकरण (विनियमितीकरण) की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद साल 2018 में नैनीताल हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के हक में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को इन्हें नियमित करने का आदेश दिया था। हालांकि, तब सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके कारण यह मामला करीब 6 साल तक शीर्ष अदालत में लंबित रहा। उपनल कर्मचारियों के संघर्ष को बड़ी कामयाबी तब मिली जब साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अनुग्रह याचिका (SLP) को खारिज करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद धामी सरकार के सामने हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने की कानूनी बाध्यता खड़ी हो गई। इसी दबाव के बीच सरकार ने पूर्ण नियमितीकरण के बजाय बीच का रास्ता निकालते हुए 'समान काम के बदले समान वेतन' देने का फैसला कैबिनेट में लिया था। शासन स्तर पर कट-ऑफ डेट को लेकर लगातार हो रहे बदलावों ने इस पूरी व्यवस्था को उलझा कर रख दिया है। सरकार ने शुरुआत में तय किया कि 25 नवंबर 2025 तक 10 साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मियों को पहले चरण में लाभ मिलेगा। वहीं, समान कार्य-समान वेतन के लिए 12 नवंबर 2018 को बेस कट-ऑफ डेट माना गया। इसके तहत 2015 से 2018 के बीच नियुक्त कर्मियों को दूसरे चरण में लाभ मिलना था। इस साल फरवरी में सरकार ने अचानक आदेश बदलते हुए 12 नवंबर 2018 को ही अंतिम कट-ऑफ डेट रखा, लेकिन चरणों में बदलाव कर दिया। इसके तहत 1 जनवरी 2016 से पहले के कर्मियों को प्रथम चरण और 2016 के बाद से नवंबर 2018 तक नियुक्त कर्मियों को दूसरे चरण में लाभ देने की बात कही गई। फरवरी में जारी हुए संशोधित आदेश और उसके बाद सरकार द्वारा जारी किए गए नए 'अनुबंध पत्र' (कॉन्ट्रेक्ट लेटर) को लेकर उपनल कर्मचारियों का गुस्सा फूट पड़ा। कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मूल भावना को कमजोर कर रही है। इसके विरोध में कर्मचारी सरकार के खिलाफ अवमानना याचिका लेकर दोबारा हाई कोर्ट पहुंच गए। हाई कोर्ट में अवमानना याचिका पर सुनवाई शुरू होते ही उत्तराखंड शासन एक बार फिर बैकफुट पर आता दिख रहा है। हाल ही में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में कट-ऑफ डेट को एक बार फिर संशोधित करने पर सहमति बनी है। अब सैनिक कल्याण विभाग द्वारा कैबिनेट में एक नया प्रस्ताव लाने की तैयारी की जा रही है। इस नए फार्मूले के तहत, सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य सरकार की याचिका खारिज करने की तारीख यानी 15 अक्टूबर 2024 को ही 'समान काम के बदले समान वेतन' के लाभ के लिए अंतिम कट-ऑफ डेट निर्धारित किया जा सकता है। उपनल कर्मचारियों का रुख इस बार बेहद कड़ा है। कर्मचारी नेताओं का साफ कहना है कि हाई कोर्ट का मूल आदेश उनके विनियमितीकरण (नियमितीकरण) को लेकर है। सरकार केवल 'समान काम के बदले समान वेतन' का झुनझुना थमाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। कर्मचारियों ने मांग की है कि सरकार को टालमटोल की नीति छोड़कर वन-टाइम सेटलमेंट के तहत सीधे नियमितीकरण पर ठोस नीतिगत फैसला लेना चाहिए। अब देखना होगा कि आगामी कैबिनेट बैठक में आने वाला यह नया प्रस्ताव कर्मचारियों के गुस्से को शांत कर पाता है या कानूनी पेचीदगियों को और बढ़ाता है।