कौड़ी के शिक्षक विवाद!डिजिटल गुरु बनाम टीवी स्टूडियो!सम्मान, जवाबदेही और शिक्षा की नई लड़ाई
भारतीय समाज में कुछ पेशे ऐसे हैं जिन्हें केवल रोजगार नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व माना जाता है। शिक्षक उनमें सबसे ऊपर है। वह केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि पीढ़ियां गढ़ता है, सपनों को दिशा देता है और समाज के भविष्य की नींव तैयार करता है। ऐसे में जब देश की एक चर्चित टीवी एंकर ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाने वाले शिक्षकों को लेकर "दो कौड़ी के टीचर" जैसी टिप्पणी करती हैं, तो विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहता। यह शिक्षक के सम्मान, शिक्षा के बदलते स्वरूप और सार्वजनिक विमर्श की मर्यादा पर भी सवाल खड़े कर देता है।
हाल ही में अंजना ओम कश्यप की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई। देशभर के यूट्यूब शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों, छात्रों और अभिभावकों ने इसका विरोध किया। यह विरोध केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस सोच के खिलाफ था जो डिजिटल शिक्षा को अब भी संदेह की नजर से देखती है।
दरअसल, भारत में शिक्षा का स्वरूप पिछले एक दशक में तेजी से बदला है। कभी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बड़े शहरों और महंगी कोचिंग संस्थाओं तक सीमित मानी जाती थी। लेकिन इंटरनेट और स्मार्टफोन ने इस दूरी को काफी हद तक समाप्त कर दिया। आज किसी गांव, कस्बे या दूरदराज के क्षेत्र में रहने वाला छात्र भी देश के चर्चित शिक्षकों तक पहुंच सकता है। कोविड महामारी के दौरान तो ऑनलाइन शिक्षा करोड़ों विद्यार्थियों के लिए एकमात्र विकल्प बन गई थी। ऐसे में डिजिटल माध्यम से पढ़ाने वाले शिक्षकों की भूमिका को पूरी तरह नकार देना वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा होगा।
यही कारण है कि जब ऑनलाइन शिक्षकों की योग्यता और योगदान पर सवाल उठाए गए तो प्रतिक्रिया भी उतनी ही तीखी आई। कई शिक्षकों ने इसे पूरे शिक्षक समुदाय का अपमान बताया। शिक्षिका बबीता मैम ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि शिक्षक "दो कौड़ी के" हैं तो ऐसे पत्रकार "फूटी कौड़ी के" भी नहीं हैं जो समाज निर्माण करने वालों का सम्मान नहीं कर सकते। वहीं खान सर ने अपने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि यदि ऑनलाइन शिक्षकों को पढ़ाना नहीं आता तो आलोचक स्वयं छात्रों को पढ़ाकर दिखाएं। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि क्या वे छात्रों को यह पढ़ाएंगे कि नोटों में चिप कैसे लगती है या नेताओं की चापलूसी कैसे की जाती है?
इन प्रतिक्रियाओं की भाषा पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इनके पीछे छिपे आक्रोश को समझना कठिन नहीं है। लाखों छात्र ऐसे हैं जिनकी सफलता की कहानी किसी डिजिटल क्लासरूम से शुरू हुई। संघ लोक सेवा आयोग, राज्य लोक सेवा आयोग, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, नीट, जेईई और यूजीसी-नेट जैसी परीक्षाओं में सफल हुए हजारों अभ्यर्थी खुले तौर पर स्वीकार करते हैं कि उनकी तैयारी में ऑनलाइन शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
लेकिन इस बहस का दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आलोचकों का कहना है कि कोचिंग उद्योग के भीतर बढ़ते व्यावसायीकरण, भ्रामक विज्ञापनों और चयनित अभ्यर्थियों का श्रेय लेने की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल उठाने की आवश्यकता है। यह तर्क पूरी तरह निराधार भी नहीं है। हाल के वर्षों में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने कई प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थानों पर भ्रामक सफलता-दावों को लेकर कार्रवाई की है। कुछ मामलों में यह पाया गया कि जिन छात्रों की सफलता का प्रचार किया गया, उनमें बड़ी संख्या ऐसे अभ्यर्थियों की थी जिन्होंने संस्थान से केवल सीमित मार्गदर्शन प्राप्त किया था, जबकि विज्ञापनों में उन्हें संस्थान की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही का स्तर कितना पर्याप्त है।
यहीं इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। क्या कुछ संस्थानों की मार्केटिंग रणनीतियों, अतिरंजित दावों या व्यावसायिक प्रवृत्तियों के आधार पर पूरे शिक्षक समुदाय को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है? शायद नहीं। जिस प्रकार कुछ पत्रकारों की गलतियों के आधार पर पूरी पत्रकारिता को खारिज नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार कुछ शिक्षकों या संस्थानों की कमियों के आधार पर पूरे शिक्षक वर्ग को "दो कौड़ी का" नहीं कहा जा सकता। दोनों ही पेशे लोकतांत्रिक समाज के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। एक समाज को शिक्षित करता है, दूसरा समाज को सूचित करता है।
दरअसल, समस्या ऑनलाइन शिक्षक बनाम पत्रकार की नहीं है। असली सवाल यह है कि शिक्षा के नाम पर किए जाने वाले दावे कितने पारदर्शी हैं, छात्रों और अभिभावकों को कितनी निष्पक्ष जानकारी मिलती है, और क्या सफलता की कहानियों के पीछे की वास्तविकता ईमानदारी से प्रस्तुत की जाती है। जब लाखों परिवार कर्ज लेकर, जमीन बेचकर या अपनी जमा-पूंजी खर्च कर बच्चों की शिक्षा में निवेश करते हैं, तब यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
विडंबना यह है कि जिस दौर में शिक्षक और पत्रकार दोनों की विश्वसनीयता पर चुनौतियां बढ़ रही हैं, उसी दौर में दोनों वर्गों को एक-दूसरे के योगदान को समझने की आवश्यकता है, न कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने की। सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के शब्दों का प्रभाव व्यापक होता है। इसलिए आलोचना तथ्य आधारित और संतुलित होनी चाहिए, न कि ऐसी जो पूरे वर्ग को अपमानित करने का आभास दे।
इस विवाद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शिक्षा का माध्यम बदल सकता है, लेकिन शिक्षक का महत्व नहीं। कभी वह ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ा था, आज कैमरे के सामने बैठा है। पहले वह एक कक्षा को पढ़ाता था, आज लाखों छात्रों तक पहुंचता है। तकनीक ने उसकी भूमिका का स्वरूप बदला है, मूल्य नहीं।
आखिरकार किसी शिक्षक का सम्मान इस बात से तय नहीं होता कि वह स्कूल में पढ़ाता है, विश्वविद्यालय में या यूट्यूब पर। उसका सम्मान इस बात से तय होता है कि उसने कितने जीवन बदले, कितने सपनों को उड़ान दी और कितने युवाओं को निराशा से निकालकर सफलता की राह दिखाई।
और शायद यही कारण है कि "दो कौड़ी के शिक्षक" वाली टिप्पणी पर इतना बड़ा विवाद खड़ा हुआ। क्योंकि करोड़ों छात्रों के लिए ये शिक्षक दो कौड़ी के नहीं, बल्कि उनके सपनों, संघर्षों और संभावनाओं के सबसे बड़े साझेदार हैं। वहीं दूसरी ओर, शिक्षा जगत से जुड़े लोगों को भी यह समझना होगा कि सम्मान के साथ-साथ जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। शिक्षक का सम्मान और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता दोनों साथ-साथ चलें, तभी इस बहस का सार्थक निष्कर्ष निकल सकेगा।