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OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, पूछा—जब माता-पिता उच्च पदों पर और आर्थिक रूप से सक्षम हैं तो आरक्षण क्यों? सामाजिक न्याय के संतुलन पर जोर

editor
  • Awaaz Desk
  • May 22, 2026 10:05 AM
The Supreme Court issued a stern remark on the OBC creamy layer, asking, "Why reservations when parents hold high positions and are financially well-off?" Emphasizes the balance of social justice.

नई दिल्ली। पिछड़े वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आरक्षण व्यवस्था की मौजूदा संरचना पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि यदि किसी छात्र के माता-पिता उच्च प्रशासनिक पदों पर हैं और आर्थिक व सामाजिक रूप से पूरी तरह सशक्त हो चुके हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए। सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि यदि किसी छात्र के माता-पिता आईएएस अधिकारी हैं, उच्च सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत स्थिति में हैं, तो उनके बच्चों को पिछड़े वर्ग के आरक्षण का लाभ देना न्यायसंगत नहीं लगता। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शैक्षिक और आर्थिक सशक्तिकरण सामाजिक गतिशीलता को जन्म देता है, ऐसे में आरक्षण का लाभ लगातार एक ही परिवार को मिलता रहना व्यवस्था के मूल उद्देश्य के विपरीत हो सकता है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य उन वर्गों को अवसर देना है जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित रहे हैं, लेकिन जब कोई परिवार आरक्षण का लाभ लेकर एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक स्थिति हासिल कर चुका हो, तब अगली पीढ़ी को उसी आधार पर लाभ देना पुनर्विचार का विषय है।

उन्होंने कहा कि यदि माता-पिता अच्छी नौकरियों में हैं, अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं और समाज में प्रभावशाली स्थिति रखते हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण व्यवस्था से बाहर आना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) और ओबीसी क्रीमी लेयर के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ईडब्ल्यूएस का आधार केवल आर्थिक कमजोरी है, जबकि ओबीसी आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है। यदि दोनों को समान मानदंडों पर रखा जाएगा, तो दोनों श्रेणियों के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इस विषय पर गहन विचार-विमर्श और संतुलन की आवश्यकता है ताकि आरक्षण का वास्तविक लाभ उन्हीं लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय की अवधारणा को बनाए रखते हुए यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आरक्षण एक स्थायी विशेषाधिकार बनकर न रह जाए। हालाकि बेंच ने याचिका पर नोटिस जारी किया।


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