आरक्षण पर आमने-सामने दो धड़ेः ब्रजेश पाठक के आश्वासन के बाद विपक्ष ने पूछे तीखे सवाल
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में आगामी विधानसभा चुनावों की हलचल के बीच आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। एक ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी दल जातिगत जनगणना में ओबीसी का अलग कॉलम जोड़ने और आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग को जोर-शोर से उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सवर्ण समाज से जुड़े संगठन आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, सुधार और इसे आर्थिक आधार से जोड़ने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। दोनों ओर से उठ रही मांगों ने राजनीतिक दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ ‘आरक्षण सुधार सत्याग्रह’ अब देश के दूसरे हिस्सों में भी चर्चा का विषय बन रहा है। सवर्ण युवाओं और सामाजिक संगठनों से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग उठाई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक स्थिति और वास्तविक सामाजिक शैक्षिक पिछड़ापन होना चाहिए। इसके साथ ही वे आरक्षण व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की मांग कर रहे हैं। आंदोलन से जुड़े हर्ष दुबे और उनके साथियों ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से मुलाकात की। बताया गया कि मुलाकात के दौरान प्रदर्शनकारियों ने आरक्षण व्यवस्था से संबंधित अपनी मांगें उनके सामने रखीं। ब्रजेश पाठक ने सरकार की ओर से इन मांगों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का भरोसा दिया। उपमुख्यमंत्री के इस कदम के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने भाजपा पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया है कि क्या भाजपा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर अपना रुख स्पष्ट करेगी? वहीं भाजपा के सामने चुनौती यह है कि आरक्षण के सवाल पर कोई भी ऐसा राजनीतिक कदम उसके अलग अलग सामाजिक समूहों के बीच संदेश को प्रभावित कर सकता है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में आरक्षण का मुद्दा इसलिए भी जटिल हो गया है क्योंकि समाज के अलग-अलग वर्गों की मांगें एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। कांग्रेस, सपा और कई अन्य विपक्षी दल जातिगत जनगणना में ओबीसी की स्पष्ट गणना और आरक्षण का दायरा बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं। उनका तर्क है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए जातिगत आंकड़े जरूरी हैं। दूसरी ओर आरक्षण सुधार आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारी मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा और आर्थिक आधार को अधिक महत्व देने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने एससी एसटी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ जैसे प्रावधान पर भी बहस की मांग उठाई है। आरक्षण को लेकर यह विरोधाभास आने वाले चुनावों में राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन सकता है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में जातीय समीकरण चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। यही नहीं प्रदर्शनकारी विश्व विद्यालयों और कॉलेजों में दलित तथा ओबीसी छात्रों से कथित भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी की ओर से बनाए गए नियमों को लेकर भी विरोध जता रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं।