• Home
  • News
  • Uproar over Minister Satpal Maharaj's statement regarding the Badrinath DJ controversy: Chardham Mahapanchayat outraged by remarks on the conch shell,clash erupts over faith and traditions.

बद्रीनाथ डीजे विवाद में मंत्री सतपाल महाराज के बयान पर बवाल: शंख पर टिप्पणी से भड़की चारधाम महापंचायत, आस्था और परंपराओं पर छिड़ी रार

editor
  • Tapas Vishwas
  • September 28, 2026 12:09 PM
Uproar over Minister Satpal Maharaj's statement regarding the Badrinath DJ controversy: Chardham Mahapanchayat outraged by remarks on the conch shell,clash erupts over faith and traditions.

देहरादून। भू-वैकुंठ बद्रीनाथ धाम में बीते 19-20 सितंबर को आयोजित 'देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल' को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक भीषण धार्मिक और राजनीतिक संग्राम का रूप ले चुका है। अराइवल प्लाजा पर आयोजित इस कार्यक्रम में डीजे की तेज धुनों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के नाम पर फिल्मी गानों पर हुए डांस और आधुनिक साउंड सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर तीर्थ पुरोहित व सनातन धर्म से जुड़े संगठन पहले ही आक्रोशित थे। लेकिन अब प्रदेश के संस्कृति, धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज द्वारा कार्यक्रम के बचाव में दिए गए बयानों और विशेष रूप से शंख को लेकर की गई टिप्पणी ने आग में घी डालने का काम कर दिया है।

बद्रीनाथ  धाम के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में आयोजित ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सांस्कृतिक कार्यक्रम से आगे बढ़कर धार्मिक परंपराओं और बयानों तक पहुंच गया है। 19 और 20 सितंबर को हुए आयोजन में तेज संगीत, डीजे और नृत्य की तस्वीरें व वीडियो सामने आने के बाद तीर्थ पुरोहितों और संतों ने कार्यक्रम के स्वरूप पर सवाल उठाए थे। अब संस्कृति-धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के शंख को लेकर दिए गए बयान पर उत्तराखंड चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। मूल विवाद इस बात को लेकर है कि बदरीनाथ जैसे प्रमुख धार्मिक स्थल के निकट आधुनिक साउंड सिस्टम और मनोरंजन आधारित कार्यक्रम का स्वरूप धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप था या नहीं। कार्यक्रम का आयोजन भारतीय सेना की पहल के तहत ऑपरेशन सद्भावना के अंतर्गत किया गया था। आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसका उद्देश्य लोक भाषाओं, लोकगीतों, लोक नृत्यों, पारंपरिक वेशभूषा, स्थानीय उत्पादों और सीमांत क्षेत्रों की संस्कृति को सामने लाना था। विवाद बढ़ने के बाद चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा। नोटिस में बिना सक्षम प्रशासनिक अनुमति बड़े आयोजन और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए हैं। प्रशासन ने यह भी कहा कि बदरीनाथ धाम की धार्मिक गरिमा को ध्यान में रखते हुए ऐसे आयोजन में निर्धारित व्यवस्थाओं का पालन जरूरी है। विवाद के बीच सतपाल महाराज ने बदरीनाथ में संगीत और वादन को पूरी तरह निषिद्ध मानने पर सवाल उठाया। उन्होंने मंदिर की परंपराओं, शंख, सेना के बैगपाइप बैंड और माणा क्षेत्र की लोक परंपराओं का उदाहरण देते हुए कहा कि धाम में संगीत अपने आप में कोई नई या पूरी तरह निषिद्ध चीज नहीं है। उनका तर्क था कि धार्मिक परंपरा में अलग-अलग अवसरों पर वाद्य और संगीत का इस्तेमाल होता रहा है। शंख को लेकर महाराज के बयान का एक हिस्सा अब विवाद का केंद्र बन गया है। उनके अनुसार मंदिर के भीतर पूजा के दौरान शंख का इस्तेमाल नहीं किए जाने के पीछे वहां की मान्यता का संदर्भ है। उन्होंने यह भी कहा कि बाहर शंख बजाया जाता है। यही टिप्पणी तीर्थ पुरोहित महापंचायत के विरोध का कारण बनी है। उत्तराखंड चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के महासचिव बृजेश सती ने मंत्री के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सनातन परंपरा में धार्मिक अनुष्ठानों और शुभ अवसरों पर शंखनाद की परंपरा रही है। उन्होंने मंत्री से धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के संदर्भ में बयान देने से पहले अध्ययन और विशेषज्ञों से सलाह लेने की बात कही। महापंचायत ने यह भी सवाल उठाया कि पारंपरिक धार्मिक वाद्य यंत्रों और आधुनिक तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। संगठन का कहना है कि बदरीनाथ जैसे तीर्थस्थल पर कार्यक्रम के स्वरूप, ध्वनि की तीव्रता और धार्मिक गतिविधियों के बीच स्पष्ट मर्यादा तय होनी चाहिए। बदरीनाथ विवाद में दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं। आयोजन से जुड़े पक्ष इसे लोक संस्कृति और सीमांत क्षेत्रों की विरासत को सामने लाने वाला कार्यक्रम बता रहे हैं, जबकि विरोध करने वाले इसे धाम की धार्मिक गरिमा और शांत वातावरण से जोड़कर देख रहे हैं। ऐसे में विवाद का केंद्र केवल ‘संगीत होना चाहिए या नहीं’ नहीं, बल्कि किस स्थान पर, किस स्वरूप में और किन नियमों के तहत सांस्कृतिक आयोजन हो, यह बन गया है। फिलहाल प्रशासनिक नोटिस के जवाब और संबंधित पक्षों की आगे की कार्रवाई पर नजर है। विवाद ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और तीर्थस्थलों की परंपरागत मर्यादाओं के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।


संबंधित आलेख: