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उत्तराखण्डः चैत्र संक्रांति पर प्रकृति और परंपरा का उत्सव! फूलदेई पर्व पर बच्चों ने घर-घर जाकर चढ़ाए फूल, गुड़-चावल और उपहार देकर बड़ों ने दिया आशीर्वाद

editor
  • Awaaz Desk
  • March 15, 2026 10:03 AM
 Uttarakhand: A celebration of nature and tradition on Chaitra Sankranti! On the occasion of Phul Dei, children went door to door offering flowers, jaggery, rice, and gifts, while elders offered blessings.

नैनीताल। हिन्दू नव वर्ष यानी चैत्र महीने की प्रथम (गते) को उत्तराखंड में फूलदेई का पर्व उल्लास और श्रद्धा से मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने का अपना एक अलग ही अंदाज है, जिसमें छोटे-छोटे बच्चे अपने आस पडोस में जाते हैं और अपने पड़ोसियों की देहली पर फूल डालते हैं और इस त्योहार को मनाते हैं। साथ ही बड़े बुजूर्गों का आर्शीवाद लेते हैं। इस दौरान बड़े बुजुर्ग बच्चों को उपहार के रूप में चावल, गुड़ व रुपए देकर आशीर्वाद देते हैं। बता दें कि देवभूमि में मनाए जाने वाले सभी पर्वों का अपना अलग महत्व होता है। यहां के त्योहार किसी न किसी रुप में प्रकृति से जुड़े होते हैं। प्रकृति ने जो उपहार उन्हें दिया है, उसके प्रति आभार प्रकट करते हैं। चैत्र मास की संक्रांति अर्थात पहले दिन से ही वसंत आगमन की खुशी में फूलों का त्योहार फूलदेई मनाया जाता है। इस फूलों के पर्व में नन्हे-मुन्ने बच्चे प्रातः सूर्योदय के साथ-साथ घर-घर की देहरी पर रंग बिरंगे फूल को चढ़ाते हुए घर की खुशहाली की कामना के गीत गाते हैं। इसका आशय यह है कि हमारा समाज फूलों के साथ नए साल की शुरूआत करे। इस दिन से लोकगीतों के गायन का अंदाज भी बदल जाता है, होली के फाग की खुमारी में डूबे लोग इस दिन से ऋतुरैंण और चैती गायन में डूबने लगते हैं। ढोल-दमाऊ बजाने वाले लोग जिन्हें बाजगी, औली या ढोली कहा जाता है वे भी इस दिन गांव के हर घर के आंगन में आकर इन गीतों को गाते हैं। जिसके फलस्वरुप घर के मुखिया द्वारा उनको चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। बसन्त के आगमन से जहां पूरा पहाड़ बुरांस की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगों से भर जाते हैं, वहीं चैत्र संक्रान्ति के दिन बच्चों द्वारा प्रकृति को इस अप्रतिम उपहार सौंपने के लिये धन्यवाद अदा करते हैं। इस दिन घरों में विशेष रुप से पकवान बनाकर आपस में बांटा जाता है। पहाड़ में फूलों का त्यौहार बच्चों को प्रकृति प्रेम और सामाजिक चिंतन की शिक्षा बचपन में ही देने का आध्यात्मिक पर्व है।


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