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उत्तराखंड: फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र केस में शिक्षा विभाग का बड़ा एक्शन, 234 प्रवक्ताओं की एम्स ऋषिकेश में होगी दोबारा जांच

editor
  • Tapas Vishwas
  • March 06, 2026 11:03 AM
Uttarakhand: Education Department takes major action in fake disability certificate case, 234 lecturers to undergo re-examination at AIIMS Rishikesh

देहरादून। उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में दिव्यांगता के फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी हथियाने के गंभीर मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। लंबे समय से चल रहे विवाद और विभागीय सुस्ती के बाद अब सरकार ने इस प्रकरण में निर्णायक कदम उठाया है। विभाग ने राज्य भर के उन सभी 234 प्रवक्ताओं की दिव्यांगता जांच दोबारा कराने का निर्णय लिया है, जिन्होंने इस श्रेणी के आधार पर सेवा का लाभ लिया है। खास बात यह है कि यह जांच किसी स्थानीय अस्पताल के बजाय अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ऋषिकेश के विशेष मेडिकल बोर्ड द्वारा की जाएगी।

इस पूरे मामले की जड़ें काफी गहरी हैं। विभागीय स्तर पर हुई प्रारंभिक जांच में पहले ही 52 प्रवक्ताओं के दिव्यांगता प्रमाण पत्र संदिग्ध या फर्जी पाए गए थे। उस समय विभाग ने संबंधित शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तो मांगा था, लेकिन कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई। इसके बाद 'नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड' और अन्य संगठनों ने इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया और मामला न्यायालय आयुक्त दिव्यांगजन तक पहुँचा। अब न्यायालय के कड़े रुख और फर्जीवाड़े की व्यापकता को देखते हुए विभाग ने सभी 234 संदिग्ध मामलों की निष्पक्ष जांच का रास्ता चुना है। शिक्षा महानिदेशालय ने इस संबंध में सभी जिलों के मुख्य शिक्षा अधिकारियों (CEOs) को सख्त निर्देश जारी कर दिए हैं। एम्स ऋषिकेश में जांच प्रक्रिया को सुव्यवस्थित रखने के लिए बाकायदा एक कैलेंडर जारी किया गया है। स्वास्थ्य परीक्षण की प्रक्रिया 7 मार्च से शुरू होगी। इसके बाद 12 मार्च, 14 मार्च, 28 मार्च और 2 अप्रैल की तिथियां निर्धारित की गई हैं। विभाग ने स्पष्ट किया है कि सभी संबंधित प्रवक्ताओं को निर्धारित तिथि पर मेडिकल बोर्ड के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना अनिवार्य होगा। शिक्षा महानिदेशक दीप्ति सिंह ने मामले की गंभीरता स्पष्ट करते हुए कहा, "यह कदम न्यायालय के निर्देशों और पारदर्शिता के सिद्धांत के तहत उठाया गया है। राज्य में जिन भी प्रवक्ताओं ने दिव्यांगता का लाभ लेकर आरक्षण या अन्य सुविधाएं ली हैं, उन सभी का मेडिकल परीक्षण कराया जाएगा। इससे वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी और किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

शिक्षा निदेशक मुकुल सती ने बताया कि विभाग इस प्रकरण को लेकर पूरी तरह संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए नौकरी पाना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि उन वास्तविक दिव्यांगों के साथ भी घोर अन्याय है जो योग्यता के बावजूद अपने हक से वंचित रह जाते हैं। विभाग की प्राथमिकता एक निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवस्था कायम करना है। गौरतलब है कि नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड ने आरोप लगाया था कि कई शिक्षकों ने केवल पदोन्नति, स्थानांतरण में छूट या नौकरी पाने के लिए फर्जी प्रमाण पत्रों का सहारा लिया है। संगठन ने न्यायालय आयुक्त दिव्यांगजन के समक्ष साक्ष्य भी प्रस्तुत किए थे। कोर्ट ने पहले ही आदेश दिए थे कि जिनके प्रमाण पत्र गलत हैं, उन पर कार्रवाई की जाए, लेकिन अब तक प्रत्यक्ष कार्रवाई न होने के कारण यह नया जांच आदेश जारी करना पड़ा है। एम्स ऋषिकेश की रिपोर्ट इस मामले में अंतिम सत्य मानी जाएगी। यदि मेडिकल बोर्ड की जांच में किसी प्रवक्ता की दिव्यांगता निर्धारित मानकों से कम पाई जाती है या प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी साबित होता है, तो संबंधित शिक्षक की सेवा समाप्ति (बर्खास्तगी) के साथ-साथ उन पर धोखाधड़ी का मुकदमा भी दर्ज किया जा सकता है। फिलहाल, इस बड़े एक्शन से शिक्षा महकमे में हड़कंप मचा हुआ है और सबकी नजरें 7 मार्च से शुरू होने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।
 


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