उत्तराखंड HC:प्लास्टिक कचरे के निस्तारण सम्बंधित कार्यो से कोर्ट नाखुश, जिलाधिकारियों के शपथपत्र से कोर्ट नही हुई संतुष्ट, प्लास्टिक का निस्तारण कागज़ों में ज़्यादा, धरातल पर नही हो रहा निर्देशो का अनुपालन
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में प्लास्टिक कचरे को पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट राज्य के जिलाधिकारियों द्वारा दिये गए शपथपत्र से संतुष्ट नही था। कोर्ट ने कहा कि प्लास्टिक कचरे के निस्तारण पर कानूनी कदम जो उठाने चाहिए थे वो नही उठाये जा रहे है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दुष्यंत मनाली ने बताया कि कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा कि पूर्व के दिशा निर्देशों और एक्ट को कम्पाइल किया जाए,राज्य द्वारा बनाई गई स्टेट लेबल मॉनिटरिंग वेस्ट प्लास्टिक मैनेजमेंट कमेटी को कोर्ट को पक्षकार बनाया और कहा कि निर्देशो का पालन करवाने के लिए यही उत्तरदायी होंगी,साथ ही पक्षकार के रूप में उनके द्वारा भी शपथपत्र दायर किया जाएगा कि किस प्रकार उनके द्वारा पूरे प्रदेश में इन निर्देशों का अनुपालन किया जा रहा है। इसके अलावा कोर्ट ने वन पंचायतों के सम्बंध में भी निर्देश दिये कि वन पंचायत सरपंचों को फंड मशीनरी स्टाफ उपलब्ध नही है इसके लिए सचिव वन इन आवश्यकताओं पर विचार करें, साथ ही राज्यभर के डीएफओ को भी निर्देश दिए कि अपनी वन पंचायतों का मानचित्र वेबसाइट पर अपलोड करे और सम्बंधित शिकायतों के लिए एप बनाएं जिसमे वन पंचायत और प्लास्टिक वेस्ट से सम्बंधित जो भी शिकायतें होंगी उन्हें दर्ज किया जा सके। कोर्ट ने मामले में अगली तिथि 19 अक्टूबर नियत की है।
आपकों बता दे कि अल्मोड़ा हवलबाग निवासी जितेंद्र यादव ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार ने प्लास्टिक यूज व उसके निस्तारण करने के लिए नियमावली बनाई गई थी। परन्तु इन नियमों का पालन नही किया जा रहा है। 2017 में केंद्र सरकार ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स बनाए गए थे जिसमे मैन्युफैक्चरिंग कम्पनी ,ब्रांडोसर्स इमोर्टर्स है उनके लिए ड्यूटी लगाई गई है कि वो अपने प्रोडक्ट के जीवनकाल तक यानी उनके द्वारा निर्मित प्रोडक्ट के पैकेज के निस्तारण तक ज़िम्मेदार होंगे,इसके लिए उन्हें रजिस्ट्रेशन करवाना आवश्यक होगा। इसके लिए उन्हें अपनी मार्केटिंग चेन के द्वारा प्लास्टिक को कलेक्ट बैक करेंगे। यानी खाली पैकेट खाली बोतल को वापस लेंगे अगर वो स्वयं ऐसा नही कर पाते तो वो नगर पालिका, नगर पंचायत इत्यादि को इसके लिए फंड उपलब्ध करवाएंगी ताकि उनके द्वारा निर्मित प्रोडक्ट के अवशेषों का निस्तारण किया जा सके।
ये दोनों ही अहम कार्य उत्तराखंड में नही किये जा रहे है जिस कारण उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र हो या मैदानी भाग हो जगह जगह प्लास्टिक के ढेर इक्कठा हो चुके है। टूरिस्ट भी आकर प्लास्टिक यहां वहां फेंक देते है जिनके निस्तारण की कोई व्यवस्था नही है इसी मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई की गई थी और अहम आदेश पारित किए गए थे जिनका पालन राज्य में ठीक से नही हो रहा।