उत्तराखण्डः धार्मिक स्थलों और हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे का मामला हाईकोर्ट पहुंचा! मुख्य सचिव को प्रत्यावेदन देने के निर्देश
नैनीताल। उतराखंड हाईकोर्ट में प्रदेश के धार्मिक स्थलों, बुग्यालों व ग्लेशियरों में जाने वाले पर्वतारोहियों व श्रद्धालुओं द्वारा अपने साथ ले जा रहे सिंगल यूज प्लास्टिक से निर्मित वस्तुओं से पर्यावरण को हो रहे नुकसान को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को अपनी समस्त मांगों को लेकर चीफ सेक्रेटरी (मुख्य सचिव) को प्रत्यावेदन देने को कहा है। जिसपर मुख्य सचिव से विचार कर सिंगल यूज प्लास्टिक को प्रतिबंध लगाने और जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश देने के साथ ही जनहित याचिका को इससे जुड़ी एक याचिका के साथ क्लब कर दिया। बता दें कि समाजसेवी व आयुर्वेदा के रिटायर्ड डॉ. आशुतोष पंत ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों, बुग्यालों व ग्लेशियरों में जाने वाले पर्यटकों और श्रदालुओं द्वारा अपने साथ खाने-पीने की प्लास्टिक युक्त सामग्री से कचरा फैलाया जा रहा है। जिसके चलते प्रदेश के जंगलों व धार्मिक स्थलों, ग्लेशियरों के साथ ही नदियों, नालों में प्लास्टिक का कचरा जमा हो गया है। इस कचरे से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। याचिका में कहा गया है कि धार्मिक स्थलों में भंडारा कराने वाले लोगों व बुग्यालों में जाने वाले पर्यटकों की निगरानी के लिए अधिकृत अधिकारी की नियुक्ति की जाए जो यह सुनिश्चित करे की जो भी यात्री या ट्रैकर अपने साथ पानी की बोतलें व अन्य खाने पीने का सामान साथ लेकर जा रहे हैं वो उसके खाली पैकेटों को अपने साथ वापस लेकर आएं। जनहित याचिका में यह भी कहा है कि भण्डारा, शादी विवाह व अन्य अनुष्ठानों पर भारी मात्रा में प्लास्टिक के गिलास, प्लेट, बोतलें और अन्य का उपयोग किया जाता है। आयोजन समाप्त होने के बाद ये कचरा वहीं बिखरा पड़ा रहता है। आयोजन कराने वाली संस्थाओं से इसको साफ कराने के लिए बांड भरवाने की भी मांग की है, जिसमें उनके द्वारा कूड़ा साफ करने की शर्त का उल्लेख हो ऐसा न करने पर उनपर जुर्माना लगाया जाए। इस जुर्माने का उपयोग कचरा हटाने वालों को दिया जाए।